Monday, 14 November 2022

भारतवाणी

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Tuesday, 1 November 2022

संस्कृत कविता और भारतीय परंपरा के अग्रदूत श्रीनिवास रथ

संस्कृत कविता और भारतीय परंपरा के अग्रदूत श्रीनिवास रथ 
                                                                         डा. संजय कुमार
                                                                         संस्कृत विभाग 
डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर म.प्र.
मो न.8989713997
                                                                                          (जयंती विशेष एक  नवम्बर )
                                                                         
                                          आधुनिक संस्कृत के नवीन चिन्तक , नवीन सर्जक तथा नवीन रचनाधर्मी  एवं अभिनवकालिदास के नाम से विख्यात श्रीनिवास रथ का जन्म कार्तिक पूर्णिमा 1 नवंबर 1933 ई . पुरी -उड़ीसा में हुआ था | उनके माता का नाम लक्ष्मीदेवी तथा पिता का नाम पं. जगन्नाथ शास्त्री “काव्यतीर्थ” था| जो गोपाल दिगंबर जैन महाविद्यालय,मुरैना  में संस्कृत के प्राध्यापक थे| गद्यचिंतामणि, प्रमेयकमलमार्तंड एवं शाकटायन  आदि ग्रंथों  का बड़े सहज भाव से इनके पिता अध्यापन करते  थे | श्रीनिवास रथ की प्रारंभिक शिक्षा पिता के सानिध्य में ही प्रारंभ हुई| इस प्रकार मुरैना से ही मध्यमा, उत्तर मध्यमा की परीक्षा उत्तीर्ण करके  1947 ई. में जिस समय भारत कठिन संघर्ष द्वारा  स्वतंत्रता प्राप्त किया   उसी समय एस.डी. कॉलेज, सहारनपुर से आप  इंटरमीडिएट की परीक्षा स सम्मान उत्तीर्ण  किये |  तत्पश्चात विक्टोरिया कॉलेज ,ग्वालियर से बी.ए.की परीक्षा उत्तीर्ण कर  काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से स्वर्ण पदक के साथ स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त किये |यद्यपि आप स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर लिए थे  फिर भी  ज्ञान की पिपासा शांत न होने के कारण राजकीय संस्कृत महाविद्यालय जो संप्रति संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के नाम से विख्यात है वहां से साहित्याचार्य की उपाधि भी  ग्रहण किये | इस तरह प्रोफेसर रथ  साहब प्राची एवं प्रतीची  दोनों शिक्षा पद्धति से अपना ज्ञान वर्धन किए और संस्कृत अध्ययन –अध्यापन को ही अपने जीवन का लक्ष बना लिए | परिणाम स्वरूप सागर विश्वविद्यालय जो  वर्तमान में डाक्टर हरीसिंह गौर विश्विद्यालय ,सागर(म.प्र.) में व्याख्याता के पद पर 1955  से कार्य करने लगे | उनकी विद्वत्ता , संस्कृत के प्रति लगन और निष्ठा के कारण संस्कृत विभाग -विक्रम विश्वविद्यालय ,उज्जैन (म.प्र.) के प्रारंभिक वर्ष में ही 1957 ई. में आप नियुक्त हो गए |यही पर आचार्य ,अध्यक्ष , संकायाध्यक्ष आदि महनीय पदों को अलंकृत करते हुए 1993 ई. सेवा निवृत्त हो गए | लेकिन  आप सरकारी सेवा से निबृत्त हुए न कि अध्ययन , अध्यापन और लेखन की अपनी प्रवृत्ति से | आप सदैव अपने ज्ञान और लेखन से संस्कृत जगत आलोकित करते रहे |   आपका संस्कृत छंद गानअद्भुत था जो कोई एक बार सुन लें तो वह श्रुति के सामान उसका स्मरण रखता था |     
                           आधुनिक संस्कृत में प्रो,श्री निवास रथ का विशेषस्थान है | इन्होने  तदेव गगनं सैव धरा , भारतीय कवितायेँ , बाणस्यातिद्वयी कथा, बलदेवचरितम आदि मूल रचनाओं के साथ भास कृत ऊरुभंगम् और  मेघदूतम् का सरल हिंदी अनुवाद भी पुस्तक के रूप में प्रकाशित है | साथ ही शोधलेख , समस्यापूर्ति एवं अभिनन्दन पत्र भी आपके द्वारा लिखा गया है जिसकी गणना श्रेष्ठ कवि कर्म के रूप में की जाती है | श्रीनिवास रथ संस्कृत कविता के बेजोड़ महारथी हैं  | कविता की कमनीयता और रसपेश्लाता पग- पग पर दिखलाई पड़ती है | उनके कविता में युगबोध मिलता है | लगभग पचास वर्षों के लेखन काल में निरंतर जीवन के विविध पक्षों को ही आप साहित्य पटल अंकित करते हुए दिखलाई पड़ते हैं | आप आप संस्कृत साहित्य के बदलते हुए  परिवेश में प्रत्येक समसामयिक आंदोलन आधुनिकता के विविध पक्ष , समकालीन जीवन  को प्रभावित करने वाली कविताएं लिखें हैं|आपकी कविताएँ सदैव वर्तमान से संबाद करती हुई दिखलाई पड़ती हैं | सनातन बोध में स्थित होकर आप जो अनुभव करते हैं वही साहित्य में उतरते भी हैं जिसका उदहारण  “तदेव गगनं सैव धरा” है | जिसमें  162 संस्कृत कवितायेँ संकलित हैं |प्रो. रथ भारत के अनेक अकादमियों के पदों पर भी अपने दायित्त्व का निर्वाह किये हैं |कालिदास अकादमी, उज्जैन के निदेशक , सिंधिया प्राच्य शोध संस्थान , उज्जैन के निदेशक ,महर्षि सान्दिपनी वेद विद्या प्रतिष्ठान के   कोषाध्यक्षके साथ उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के मानद निदेशक आदि के साथ विश्विद्यालय अनुदान आयोग ,व विभिन्न विश्वविद्यालयों के अकादमिक समितियों के सदस्य भी आप रह चुके हैं | ऐसे कम लोग होते जो लेखन और प्रशासन दोनों में  दक्ष रहते हों लेकिन  उनमें से आप एक हैं |
                              आपको सारस्वत योगदान के लिए राष्ट्रपति सम्मान , राजशेखर सम्मान , साहित्य अकादमी पुरस्कार , विश्व भारती पुरस्कार , कवि सार्वभौम राजप्रभा पुरस्कार ,प.राज जगन्नाथ सम्मान एवं  महामहोपाध्याय उपाधि ,आदि  प्रदान किया गया है |दसवें विश्व संस्कृत सम्मलेन में बंगलौर के उपाध्यक्ष तथा इटली में होने वाले ग्यारहवें विश्व संस्कृत सम्मलेन में आप मानव संसाधन विकास मंत्रालय , भरत सरकार के प्रतिनिधि के रूप उपस्थित रहे  जो भारत और संस्कृत जगत के लिए गौरव की बात है |
                   श्रीनिवास रथ निरंतर साहित्य सेवा को  अपना धर्म मानकर करते रहे | शोध की गुत्थियों के साथ संस्कृत नव  कविता विलास को उच्च शिखर पर पहुचाने का श्रेय आपको ही जाता है | आप जितना मनुष्य के व्यक्तित्त्व के विषय में चिंतित रहते हैं उतने ही प्रकृति से भी गहरा नाता रखते हैं | उन्हें तालाब,नदियों ,वृक्ष ,पर्वत , पठार बड़े प्रभावित करते थे, उनकी  विकृति से  उन्हें कष्ट होता था | मनुष्य की सामाजिकता की बहुत चिंता थी और समाज विरोधी सरकार के नीतियों के विरोध का आत्मबल भी उनमे था | भारतीय संस्कृति का संवर्धन ही उनका ध्येय था |उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति ही मनुष्य को मनुष्य बनती है | जिसे इसका बोध हो गया वह मानव नहीं महामानव बन जाता है| पुरुषार्थ ,संस्कार ,आश्रम से संबलित मानव जीवन श्रेष्ठ और उत्तम है |  महाकाल के सानिध्य में जीवन को बड़े अच्छे रूप से जीते हुए कविता कामिनी के विलास पुरुष 13 जून  1914ई. को अपने भौतिक शरीर का परित्याग कर यश: शरीर में  विलीन हो गए |

Saturday, 3 September 2022

रामजी उपाध्याय विनिबंध पुस्तक ही नहीं ज्ञान सेतु भी


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‘रामजी उपाध्याय’ विनिबंध पुस्तक ही नहीं, ज्ञान-सेतु भी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।

पुस्तक: भारतीय साहित्य के निर्माता: रामजी उपाध्याय
लेखक: सञ्जय कुमार 
प्रकाशक: साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष: 2021 
मूल्य: ₹ 50 रुपये
सम्पूर्ण पृष्ठ संख्या: 114 

संस्कृत साहित्य विपुल है, और विभिन्न विधाओं में संस्कृत में लेखन पाठक और पुस्तक के बीच पाठ का सेतु बनाते आये हैं। इसके एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रामजी उपाध्याय भी संस्कृत साहित्य में रहे हैं। सञ्जय कुमार की साहित्य अकादमी से प्रकाशित पुस्तक भारतीय साहित्य के निर्माता: रामजी उपाध्याय पढ़ते हुए यही प्रतीत होता है। यह एक बिनिबंध है जिसे साहित्य अकादमी ने बहुत ही सुन्दर लकेवर में उनकी छवि सहित प्रकाशित किया है।

बतौर लेखक सञ्जय कुमार ने स्वयं इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि रामजी उपाध्याय आधुनिक संस्कृत साहित्य परम्परा के प्रमुख रचनाकार हैं, जिनकी कृतियों में स्त्री समाज, चरित्र निर्माण, जीवन संघर्ष, पर्यावरण तथा आकाँक्षाओं के संवेदना को प्रवण दृष्टि के रूप में अभिव्यक्ति मिली है। कोई भी रचनाकार अपने समय के औचित्य तथा मुद्दों से प्रभावित होता है और अपनी संवेदना से समय के साथ प्रश्न करता है। सर्जक उस सत्य का खोज करता है अपनी रचना में जो किसी न किसी कारण से दूसरों के लिए पहेली बना होता है। सञ्जय कुमार ने भी अपनी पुस्तक में इसी सत्य की खोज अपने बिनिबंध में किया है। इस पुस्तक में एक महान संस्कृतविद के रचना-प्रक्रिया और उसके सृजन पर बेबाक तरीके से पड़ताल की गई है। रामजी उपाध्याय के उन पहलुओं को इस पुस्तक में उजागर किया है जो शायद संस्कृत पाठकों के बीच कुतूहल के विषय थे।

भारतीय साहित्य के निर्माता रामजी उपाध्याय में सञ्जय जी ने पूरे विनिबंध को सात अध्यायों में विभक्त करके पूरी पुस्तक को तैयार किया है। जिसमें वह रामजी उपाध्याय की साहित्यिक अभिरुचि एवं आधुनिक संस्कृत विकास यात्रा का अवलोकन किया है तो दूसरे अध्याय में रामजी उपाध्याय के जीवन के पूरे रचनाधर्मी व्यक्तित्त्व पर प्रकाश डाला है। तीसरे से छठे अध्याय में क्रमशः रामजी उपाध्याय के गद्य साहित्य, नाट्य साहित्य, आलोचना साहित्य, समाज दर्शन को रेखांकित किया गया है। इस विनिबंध का सातवाँ अध्याय नवीन उद्भावनाओं और उन विशिष्टिताओं को प्रकट करते हुए खुद सञ्जय जी ने लिखा है कि विश्व साहित्य इनसे (रामजी उपाध्याय जी से) प्रभावित हुआ है।

विनिबंध में सुंदर भाव में सृजित पुस्तक का सारांश, निःसंदेह इस पुस्तक की कलात्मकता को प्रस्तुत करता है। कुल 114 पृष्ठों में रची गयी यह एक सुंदर कृति अब पाठकों के बीच आई है तो निश्चित ही पाठकों के बीच लोकप्रियता हासिल करेगी। और करे भी क्यों नहीं? वस्तुतः कोई भी पुस्तक अपने बुनावट और शिल्प के आधार पर पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करती है और सञ्जय कुमार जी की मेहनत और उनका श्रेष्ठ श्रम इस पुस्तक में जो लगा है उससे यह पुस्तक गंभीर बन पड़ी है। इसमें शोध और बोध दोनों का समन्वय मिलता है जिससे भाषागत इसकी समृद्धता भी दिखती है और पाठक एक बार में सम्पूर्ण पुस्तक का रसास्वादन करना पसंद करेगा।

मदनमोहनमालवीयकीर्तिमंजरीनाटकं, नंदगौतामीयम, कैकेयी-विजयं, सत्यहरिश्चंद्रोदयम और दासुपर्णा के माध्यम से रामजी उपाध्याय के समाज दर्शन की सुन्दर मीमांसा सञ्जय जी ने अपनी इस छोटी सी पुस्तक में की है जो न केवल दृष्टान्तों के साथ एक सजग विश्लेषण की अभिव्यक्ति है बल्कि लेखक के भी बौद्धिक विचार-संरचना की समृद्धता को अभिव्यक्त करता है। लेखक ने रामजी उपाध्याय के व्यक्तित्त्व को परखते हुए उनके उन रचनाओं पर विहंगम दृष्टि डालने की कोशिश की है ताकि वह उनके सूक्ष्म और सार्वभौम चिन्तन के साथ व्यक्तित्व को अभिव्यक्त कर सके।

भारत के वैदिक साहित्य और भारतीय वांग्मय के अन्य साहित्य हमारे लिए अभी भी पहुँच से बाहर हैं। इसकी मुख्य वजह मेरी दृष्टि से संस्कृत साहित्य और संस्कृत भाषा के साथ आम लोगों का तादात्म्य नहीं बन पा रहा है। यदि आज आंग्ल भाषा लोगों की जरूरत भाषा बन गयी है और भारत की अनेकों भाषाएँ अपने क्षेत्रीय पहचान बनकर अपना अस्तित्व खोज रही है और भारत को जोड़ने वाली एक मात्र भाषा हिंदी भारत में रह गयी है तो सञ्जय कुमार जी ने जो हिंदी में इस विनिबंध का नियोजन, लेखन, शोध और साहित्य सृजन किया है, तो निश्चित रूप से यह पुस्तक भारत के अधिकांश पाठकों के हाथों में जाएगी और लोग इसे पढ़कर संस्कृत साहित्य के संवेदनशील लेखक रामजी उपाध्याय के बारे में, उनके रचनाओं के बारें जान सकेंगे, यह सबसे अच्छी बात है। 

आधुनिक संस्कृत साहित्य में नए विमर्शों को लेकर रामजी उपाध्याय चर्चा के केंद्र में रहे हैं और उन्होंने विभिन्न एपिक रचनाओं के साथ गाँधी जैसे महान व्यक्तित्व को भी अपने रचना के केंद्र में रखा। लेकिन वे विषय और व्यक्तित्व किस प्रकार आये हैं, उसका उद्घाटन तो इस विनिबंध में मिलेगा जो सञ्जय कुमार ने सृजित किया है।

सब मिलाकर यदि देखा जाए तो विनिबंध भारतीय साहित्य के निर्माता रामजी उपाध्याय एक समृद्ध चिन्तन का परिणाम है। मेरी दृष्टि से इसे प्रत्येक पाठक को पढ़ना चाहिए और उन लोगों को अवश्य पढ़ना चाहिए जो संस्कृत साहित्य से अनुराग रखते हैं और संस्कृत रचनाकारों के बारे में कुछ जानना चाहते हैं। यह मैं बहुत दावे के साथ कह सकता हूँ कि सजग, सहज और संस्कृतनिष्ठ भाषा से परिपूर्ण यह विनिबंध न केवल संग्रहणीय है अपितु अपने ज्ञानानुशासन में यदि नई दृष्टि के साथ कोई कुछ सृजित भी करना चाहता है तो भी इस पुस्तक का अवलोकन किया जाना चाहिए।


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Friday, 22 July 2022

बालगंगाधर तिलक की राष्टवादी पत्रकारिता


                                                  (जयंती विशेष)

                             डॉ. सञ्जय कुमार
                           संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर ,( म.प्र.)
                                             Mo.No.8989713997,9450819699
                                          Email-drkumarsanjaybhu@gmail.com
                                                   भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और राष्ट्रवाद के जनक बालगंगाधर तिलक का जन्म  23 जुलाई 1856  ईस्वी में  हुआ था |  इनके पिता का नाम श्री गंगाधरपंत था तथा जो एक  मराठी पाठशाला में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत थे| बालगंगाधर तिलक को  जीवन की थाती  पिता से ही प्राप्त हुई थी | उन्हीं से  प्रेरणा प्राप्त करके बालगंगाधर तिलक भारतीय स्वतंत्रता, भारतीय संस्कृति,अशिक्षा , गरीबी  और भारतीय दुर्दशा आदि समस्याओं पर विचार करते थे एवं समाधान का चिंतन करते थे |वे ऐसे देश की कल्पना करते थे जो स्वतंत्र हो ,जहाँ के लोग अपने मन के अनुसार कार्य कर सके और मन की बात कर सके |  मनुष्य स्वतंत्र जन्म लिया है इसलिए स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने का वह अधिकारी है | इसी  लिए उन्होंने एक नारा दिया - स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है |यह नारा इतना लोकप्रिय  हुआ कि प्रत्येक भारतवासी इस नारे पर कुर्बान होने के लिए तत्पर हो गया | स्वतंत्रता की चाहत और बढ़ने लगी |बच्चे ,बूढ़े ,जवान सबमें स्वतंत्रता भूख  अग्नि के समान बढ़ने लगी और देश स्वतंत्रता के लिए अति उत्साहित हो गया | जब बालगंगाधर तिलक इस धरा –धाम जब  पर अवतरित हुए तब भारत अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा था | देश की विषम अवस्था जग जाहिर थी |लोग हताश –निराश थे |आशा की एक किरण भी दूर –दूर तक नजर नहीं आ रही थी |लेकिन माँ भारतीके कोख से उस समय  ऐसे अनेक रत्नों ने जन्म लिये जिन्मे बालगंगाधर तिलक एक थे |  
         उस समय  अशिक्षा, बेरोजगारी अपनी चरम पर थी और इससे भी कष्टकर थी   अंग्रेजों की परतंत्रता , जो प्रत्येक भारतीय के लिए अभिशाप बन गयी थी |  परतंत्रता मनुष्य की के लिए कलंक  के समान होती है|यह जीवन को निरुपाय बना देती है | जरा विचार कीजिए कि जब आप अपने मन की बात किसी से न कर सकते और न वह कर सकते हैं जिसे आपकी चेतना करना चाहती है| तो आप उस समय  स्वयं को कितना विवश और असहाय समझेगें | इस विकट समस्या से बालगंगाधर तिलक  देश को मुक्त करना चाहते थे | जिसके लिए वे  सबसे बड़ा अस्त्र शिक्षा और पत्रकारिता को मानते थे | वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जिससे भारत की आर्थिक दशा में सुधार हो और देश अंग्रेजों के शासन से मुक्त हो सके | आधुनिक शिक्षा को बालगंगाधर तिलक इसलिए अनिवार्य मानते थे क्योंकि अंग्रेजों का सामना बिना आधुनिक शिक्षा या भाषा को जाने संभव नहीं था | आधुनिक शिक्षा के द्वारा ही भारतीय समाज के पिछड़ेपन को दूर किया जा सकता है| जिसके लिए  वे 2 जनवरी 1880 में आगरकर और विष्णुशास्त्री  चिपलूणकर की सहायता से एक न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना किए| इस स्कूल में शिक्षक के रूप में महादेव जोशी और शिवराम आप्टे भी कार्यरत थे | शिवराम आप्टे संस्कृत के बड़े विद्वान अध्यापक थे |उन्होंने संस्कृत ,हिंदी, अंग्रेजी के अनेक  कोशों का निर्माण किया है   |
         बालगंगाधर तिलक शिक्षा के लिए पूरे भारत को आवाहन करते हुए किसी सभा में कहा था कि साथियों ! हमारा देश शिक्षा के अभाव में पिछड़े देशों में गिना जाता है| यही कारण है कि अंग्रेज भारत की जनता का शोषण कर रहे हैं| उन्हें गुलाम बनाकर रखें हैं | ऐसे में हर भारतवासी को शिक्षा प्राप्त करने की जरूरत है | इसके लिए हमने एक स्कूल का श्रीगणेश भी किया है |  इस स्कूल में भारत के सभी लोग आ सकते हैं ,यहां सभी को भारत की आधुनिक शिक्षा से अवगत कराया जायेगा | जिससे देश की जनता को बाहर की दुनिया का ज्ञान भी होगा | सभी  अपने देश की दशा को समझे , समाज की दशा को समझे| इससे उनके  व्यक्तित्व का  विकास होगा |अतः  मेरी आप सभी से प्रार्थना है कि आप हमारे स्कूल में आकर आधुनिक शिक्षा प्राप्त करें| बालगंगाधर तिलक कुप्रथा के रूप में बालविवाह, सतीप्रथा, पर्दाप्रथा,  विधवा दुर्दशा आदि का कारण अशिक्षा को ही मानते थे | इस तरह शिक्षा के द्वारा अपने देश को हर प्रकार से  स्वतंत्र और सशक्त बनाने का दृढ़ निश्चय बाल गंगाधर तिलक के मानस  में विद्यमान था |एक बात और महत्वपूर्ण है कि वे  शिक्षा को आय के साधन के रूप में नहीं मानते थे यही कारण था कि स्वयं स्थापित किया हुआ स्कूल जब डेक्कन एजुकेशन सोसायटी के अंतर्गत आ गया और सोसायटी द्वारा निरन्तर पैसे को लेकर तनाव बढने  लगा तो इन्होंने सोसायटी और स्कूल दोनों इस्तीफा दे दिया |  
        स्वतंत्रता के लिए  दूसरा  अस्त्र वे  पत्रकारिता को मानते थे | पत्रकारिता किसी समस्या को समाज के सामने बड़े प्रभावकारी  रूप से केवल  उपस्थित ही नहीं करती है बल्कि  उस समस्या से समाज को अवगत कराती हुई उसके समाधान का मार्गप्रशस्त करती है |इसलिए उन्होंने मराठी में केसरी  और अंग्रेजी में मराठा साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन भी प्रारम्भ  किया था| इन दोनों समाचारपत्रों से लोगों में राजनीतिक चेतना का गहरा प्रभाव  राष्ट्रीय स्तर पर पड़ा | स्वतंत्रता किसी देश के लिए क्यों आवश्यक है और अंग्रेजी सरकार भारत  के प्रति अपना क्या दृष्टिकोण रखते हैं एवं उनकी उपभोगवादी नीति को सबके सामने लाने में इन समाचारपत्रों की भूमिका अग्रणी थी  | बालगंगाधर तिलक का मानना था कि जब – तक अंग्रेजों का भारतीय जनता के प्रति  विचार और दृष्टिकोण सम्पूर्ण जन-मानस तक नहीं पहुचेगा तबतक स्वतंत्रता का संघर्ष राष्ट्र व्यापी नहीं बान सकेगा |पत्रकारिता ही देश और समाज को संरक्षण – संबर्धन प्रदान करने की सशक्त स्थली है | इस पत्रकारिता को जितने ईमानदारी और कर्मठता से संचालित किया जायेगा देश उतना ही सशक्त और उन्नतशील बनेगा | उन्हें अध्यात्म से बड़ा लगाव था जिसके पूर्ति के लिए वे निरंतर श्रीमद्भागवद्गीता का अध्ययन करते थे, परिणामत: उन्होंने गीतारहस्य का प्रणयन किया |जिसमें बालगंगाधर तिलक ने बताया है कि   मानवता का  नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना ही  श्रीमद्भागवद्गीता का सन्देश है | श्रीमद्भागवद्गीता  मनुष्य को संसार से कभी विमुख होने की प्रेरणा नहीं देती बल्कि निष्काम कर्म का प्रतिपादन करती है| देश सेवा का गुरुभार निष्काम कर्मयोगी के द्वारा ही संभव है | बालगंगाधर तिलक वास्तव में भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति बहुत निष्ठा भी रखते थे |उन्होंने वेदों में आर्कटिक होम नामक एक ग्रन्थ भी लिखा है जिसमें वेदों के कालखंड के सम्बन्ध में गंभीर विवेचना की गयी है | बालगंगाधर तिलक भारतीय जनता को एक  सूत्र में बाधना चाहते थे | जीवन की सुघरता समूह  में ही निखरती है| इसलिए  गणेश उत्सव और शिवाजी दिवस का आयोजन उनके द्वारा किया जाता था | बालगंगाधर तिलक का मानना था कि  इस भूमि पर जो लोग पैदा हुएं हैं ,जो लोग  यहाँ रहते हैं उन सब का कर्तव्य है कि इस भूमि के संरक्षण –संबर्धन में अपना योगदान दें | बालगंगाधर तिलक के व्यक्तित्व कृतित्व पर आधारित अनेक भाषाओं में काव्य रचनाएं  भी की गई है  जिसमें संस्कृत भाषा का भी  नाम आता है| माधवहरी अणे द्वारा तिलकयशोर्णव: नामक वृहद् महाकाव्य की रचना की गयी है| माधवहरी अणे के  बालगंगाधर तिलक राजनीतिक गुरु थे| तिलक की प्रेरणा से वे  स्वतंत्रता संग्राम के प्रहरी बने | इसलिए उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होकर  तिलक की राष्ट्रभक्तिमय   व्यक्तित्व इस महाकाव्य में प्रदान किया  है| तिलक गाथा के दूसरे बड़े संस्कृत कवि अप्पाशास्त्री राशिवडेकर का नाम आता है |  उनके द्वारा  तिलकमहाशयस्य कारागृहनिवास: नामक गीतिकाव्य लिखा गया है| इसमें अनेक पद्यों द्वारा  तिलक  के स्वतंत्रता संघर्ष और मांडले जेल की कार्यशैली को रेखांकित किया गया है |
   बालगंगाधर तिलक एक राष्ट्र प्रहरी के समान अडिग रूप राष्ट्र सेवा में तत्पर रहने वाले स्वतंत्रता सेनानी थे | वे कभी परिस्थिति से निराश होने वाले नहीं थे | उन्होंने  सदैव राष्ट्र सेवा को आगे रखा | पारिवारिक जीवन राष्ट्र सेवा में कभी बाधक नहीं अपितु साधक ही रहा |बालगंगाधर तिलक निरंतर अंग्रेजी सरकार की गलत  नीतियों का विरोध करते रहे | उनके फूट डालो और राज्य करो को कभी भी सफल नहीं होने दिए | उनके द्वारा होमरूल लीग की स्थापना की गयी |बताया जाता है कि 1915 ई.में पुणे में राष्ट्रवादियों का एक सम्मलेन आयोजित किया गया  था | जिसका आयोजन तिलक ने अपने साथियों के सहयोग से किया था | सम्मलेन में उन्होंने राष्ट्रवादी आन्दोलन के लिए लोगों से आवाहन किया तथा यह भी कहा कि अब देश में  होमरूल लाने की आवश्यकता है  |किन्तु नरमपंथियों द्वारा इस प्रस्ताव का विरोध किया गया लेकिन कुछ मतभेदों के साथ अन्तत:1916  ई.में होमरूल लीग की स्थापना हो गयी |जिसका उद्देश्य अंग्रेजी सरकार से वैधानिक रूप से स्वशासन ग्रहण करना था | इसके संस्थापक बालगंगाधर तिलक थे लेकिन उन्होंने इससे सम्बंधित किसी पद को स्वीकार नहीं किया था |
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