Tuesday, 22 June 2021

संस्कृत अनुवाद के अग्रदूत महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी

संस्कृत अनुवाद के अग्रदूत महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी ( जन्म जयंती विशेष-5 जून) डॉ.सञ्जय कुमार सहायक आचार्य-संस्कृत विभाग डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर,म.प्र. मो. न. 8989713997 Email- drkumarsanjaybhu@gmail.com विश्व साहित्य में संस्कृत साहित्य का स्थान श्रेष्ठ है।इसका व्याकरण और भाषा चिन्तन का जो स्वरूप निर्मित किया गया है वह अद्भुत है। बाल्मीकि, कालिदास,अश्वघोष,भारवि,माघ, भवभूति, बाणभट्ट , दण्डी और श्रीहर्ष आदि कवियों ने संस्कृत काव्य गरिमा की धवल अजस्र धारा को प्रवाहित किया है।यह प्रवाह केवल यहीं तक प्रवाहित नहीं हुआ बल्कि आज तक अपने प्रवाहमान स्थिति में वर्तमान है। रामजी उपाध्याय,रेवाप्रसाद द्विवेदी, श्रीनिवास रथ, शिवजी उपाध्याय, अभिराराजेन्द्र मिश्र, राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रभुनाथ द्विवेदी इत्यादि के साथ महात्मा पं.प्रेमनारायण द्विवेदी ने भी आधुनिक संस्कृत सरिता का जो जलप्लावन किया है वह बारिश की फूहार जैसी मनोरम और शीतलता प्रदान करने वाली है।इन आधुनिक संस्कृत कवियों में महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी का स्थान इस लिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्होंने अपने मौलिक रचनाओं के साथ संस्कृत अनुवाद की जो परम्परा विकसित की वह अतुलनीय है। उन्होंने हिन्दी, बुन्देली, ब्रजभाषा,अवधी आदि भाषाओं के अनेक काव्यों का संस्कृत भाषा में लगभग २१ हजार श्लोकों के रूप में अनुवाद किया है। जिसके लिए द्विवेदी जी को अनुवादक शिरोमणि भी कहा जाता है। महात्मा पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जनपद अन्तर्गत बड़ा बजार क्षेत्र में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी दिन सोमवार ५ जून,१९२२ ई.को हुआ था। इनके पिता का नाम परमानन्द द्विवेदी तथा माता का नाम रूक्मिणी देवी था। इनके पिता पं. परमानन्द द्विवेदी धार्मिक एवं कर्मकांड से जुड़े विद्वान ब्राह्मण थे।जिनका प्रभाव बालक प्रेमनारायण द्विवेदी पर भी पड़ा।पं.प्रेमनारायण द्विवेदी को बचपन से ही भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति अगाध स्नेह और विश्वास था। जिसके कारण उनका जीवन सहज और अत्यंत सरल था। उनके मन में किसी के प्रति राग-द्वेष की भावना रंच मात्र भी नहीं रहा करती थी। सबके कल्याण में अपने कल्याण की भावना प्रबल थी। उन्हें लोकयश या आत्मा प्रसिद्धि का स्पर्श नहीं था केवल कर्म करने का विश्वास ही उनका आत्मविश्वास था, जिसके कारण लोग उन्हें महात्मा कहते थे। अंग्रेजी शासन की भारत दुर्दशा के साक्षी थे।इस लिए भारतीय धर्म, संस्कृति ज्ञान, विज्ञान के मूल्य को समझते थे और सबको समझाने का भी प्रयास करते थे।उनका मानना था कि भारतीय धर्म और संस्कृति में वह चेतनता है जो शाश्वतता की ओर मनुष्य को प्रवृत्त करती है। पं.द्विवेदी जी की प्रारम्भिक शिक्षा सागर स्थित चकरा घाट के संस्कृत विद्यालय से सम्पन्न हुई। विद्यालयी शिक्षा क्विंस कालेज, वाराणसी से सम्पन्न हुई तथा विश्वविद्यालयी शिक्षा उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। जिसका नाम अब डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय हो गया है। यही से महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी जी स्नातक तथा स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण कर 1965 ई.में 'वैश्णव पुराणों में आचार समीक्षा' विषय पर पी-एच.डी.की उपाधि प्राप्त की थी। पं.प्रेमनारायण द्विवेदी जी जन्मजात एक शिक्षक थे। उन्हें पढ़ाने का बहुत शौक था।फलत: उन्होंने 1944 ई.में अध्यापन कार्य प्रारंभ कर दिया था। द्विवेदी जी अपने अध्यापकीय रुचि के कारण खुरई ,बारधा, गढ़ाकोटा आदि के संस्कृत विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया था।अनन्तर 22 जुलाई 1955 ई.में उनकी नियुक्ति मोराजी प्राथमिक शाला में हो गयी।1958ई. में आप संस्कृत शिक्षक के रूप में पदोन्नत होकर मोतीलाल नेहरू माध्यमिक विद्यालय कटरा, सागर,म.प्र. में पहुंच गये। वहीं शिक्षण कार्य करते हुए जून 1980ई में सेवानिवृत्त हो गए। लेकिन वे केवल सरकारी विद्यालय की सेवा से निवृत्त हुए न कि अपने अध्यापकीय जीवन शैली स और लेखन कार्य से। वे पद प्रतिष्ठा से सदा दूर एक साधक की भांति जीवन व्यतीत करने के पक्षधर थे । उन्हें सागर से बहुत लगाव था जिसके कारण अनेक महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में सेवा के अवसर को उन्होंने छोड़ दिया। लेकिन कर्म में इतनी बड़ी शक्ति होती है कि इच्छा न रहते हुए भी उसका फल मिलता ही है। सेवा निवृत्ति के बाद पं.प्रेमनारायण द्विवेदी ने संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में अतिथि आचार्य के रूप में अध्यापन कार्य किया तत्पश्चात सामवेद संस्कृत महाविद्यालय, सागर में प्राचार्य के रूप में भी अपने दायित्व का निर्वहन किये थे। प्रेमनारायण द्विवेदी किसी विश्वविद्यालय में स्थाई रूप से शिक्षण कार्य न करते हुए भी संस्कृत साहित्य का जो प्रकाश पुंज प्रकाशित किया वह विश्व संस्कृत आलय के समान अगाध और महत्वपूर्ण है। उन्होंने 'काव्य निर्झर' और 'स्तुतिकुसुममाला' नामक मौलिक रचनाएं की हैं। इसके साथ-साथ लघुकाव्य संग्रह के रूप में अनेक पद्य 'विविधकाव्य संग्रह' के नाम से प्रकाशित है ।इस संग्रह में अनेक समसामयिक विषयों पर संस्कृत भाषा में पद्य प्रकाशित हैं। संयोग से विश्व पर्यावरण दिवस के दिन ही द्विवेदी जी का जन्म दिवस भी पड़ता है इसलिए उन्होंने पर्यावरण से सम्बन्धित अनेक संस्कृत पद्यों भी की रचना की है। पं. प्रेमनारायण द्विवेदी के द्वारा जो संस्कृतानुवाद की परम्परा विकसित की गई है वह बहुत महत्वपूर्ण है। संस्कृत काव्यों का अन्य भाषाओं में अनुवाद की परम्परा तो मिलती है लेकिन अन्य काव्यों का संस्कृत में अनुवाद कम ही मिलते हैं। द्विवेदी जी ने हिन्दी, बुन्देली, अवधी, ब्रजभाषा आदि भाषाओं की रचनाओं का छन्दमय संस्कृतानुवाद किया है। सबसे बड़ी बात उनके अनुदित साहित्य की यह है कि कहीं भी उनमें भाव और गाम्भीर्यता में कोई कमी नहीं बल्कि उत्तरोत्तर काव्य गुणों से समन्वित तत्वों को ग्रहण किया गया है। उन्होंने तुलसीदासकृत ये श्रीरामचरितमानस का ‘श्रीमद्रामचरितमानसम्’ नाम से, विहारी सतसई का ‘सप्तशती’ संग्रह नाम से संस्कृत भाषा में अनुवाद किया है।साथ ही तुलसीदास , सूरदास के पद्यों का संस्कृत अनुवाद “तुलसीसूरकाव्यसंग्रह” के रूप में किया है। हिन्दी के अन्य कवियों कबीरदास, मीरा, रसखान,उद्धव, जयशंकर प्रसाद, महादेव वर्मा, आदि के साथ बुन्देली कवि ईसुरी तथा ब्रजभाषा के कवि पद्माकर के भी अनेक कविताओं का पं. प्रेमनारायण द्विवेदी संस्कृत अनुवाद किए हैं। इस तरह द्विवेदी जी का अनुदित साहित्य विशाल और उन्नत है। संस्कृत भाषा में प्रेमनारायण द्विवेदी से बड़ा अनुवादक आज तक कोई नहीं हुआ है इस लिए उन्हें संस्कृत अनुवाद का अग्रदूत भी कहा जाता है। पं.प्रेमनारायण द्विवेदी की सारस्वत साधना के लिए भारत सरकार ने संस्कृत विद्वत् सम्मान एवं राष्ट्रपति सम्मान से विभूषित किया है। दिल्ली संस्कृत अकादमी तथा कालिदास संस्कृत अकादमी आदि के द्वारा भी इन्हें प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।पं. प्रेमनारायण द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के आधार पर डांकटर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन, तथा केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, (भोपाल परिसर) मध्यप्रदेश से अनेकों शोध कार्य हुएं हैं। इस प्रकार पं.प्रेमनारायण द्विवेदी विना थके साहित्य सर्जना में आजीवन संलग्न रहे। सदैव नित नूतन साहित्य से संस्कृत साहित्य एवं भारतीय संस्कृति को समृद्ध करने में अहम भूमिका का निर्वाह किये हैं। उनके काव्य और अनुदित साहित्य दोनों ही भारतीय ज्ञान- विज्ञान, परम्परा, दर्शन, धर्म और संस्कृति की प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। उनका अनुदित साहित्य भारतीय जीवन दर्शन का स्पष्ट झांकी प्रस्तुत करता है और पाठक को काव्य लोक में प्रतिष्ठित करता है।जीवन के अन्तिम क्षणों में भी अध्ययन,लेखन, और अध्यापन की सारस्वत साधना करते हुए २८अप्रैल, २००६ ई. को अपने भौतिक शरीर का त्याग कर देवलोक में प्रतिष्ठित हो गये। बताया जाता है कि महात्मा पं. प्रेमनारायण द्विवेदी महाप्रयाण के दिन प्रयाण से कुछ क्षण पूर्व 'हृदि तोषो नानीत:' कविता लिखे तदोपरांत पद्मासन में ओंकार मंत्र के ध्वनि के साथ अपनी पंच भौतिक शरीर को त्याग कर हमेशा हमेशा के लिए अनन्त में विलीन हो गये। ऐसे संस्कृत के समुपासक महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी के जन्म जयंती के अवसर पर हम उन्हें शब्द्कुशुमांजलि अर्पित करते हैं।

Sunday, 14 February 2021

साहित्य- संगीत की अनन्य उपासिका वनमाला भवालकर

साहित्य- संगीत की अनन्य उपासिका वनमाला भवालकर (जन्म जयंती विशेष ८ फरवरी ) डॉ. सञ्जय कुमार सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर ,( म.प्र.) Mo.No.8989713997,9450819699 Email-drkumarsanjayBhu@gmail.com डॉ.वनमाला भवालकर आधुनिक संस्कृत काव्य गरिमा के उन्नायक लेखकों में से एक हैं।इनकी संस्कृत संगीतकाएं, गद्य, रूपक, स्तोत्र और संस्कृत कविताओं से संस्कृत जगत् आलोकि है। साहित्य और संगीत के द्वारा डॉ.वनमाल भवालकर का अभिनव काव्य रूप विधान, मौलिक रचना प्रक्रिया व प्रभावपूर्ण भावोद्बोधन की क्षमता अद्वितीय है। हासिए पर रहे स्त्री शिक्षा एवं सम्वर्धन की सदैव प्रेरणा स्रोत बनने वाली डॉ.वनमाला भवालकर का जन्म कर्नाटका के बेलगांव नगर में ८ फरवरी १९१४ ई को ‌हुआ था। इनके पिता महामहिम श्री नारायण राव लोकूर बम्बई उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश थे तथा माता श्रीमती लक्ष्मी बाई लोकूर एक गृहिणी थी।उनका परिवार बहुत सम्पन्न था लेकिन भारत विपन्न।गुलामी की अर्गला में जकड़े हुए भारत की दुर्दशा वनमाला भवालकर अपने आंखों से देखा था। अशिक्षा और गरीबी से उनका हृदय प्रारम्भ से द्रवित था और स्त्रियों की दशा ने तो उन्हें करुणा का सागर बना दिया था। एतदर्थ पहले वे स्वयं शिक्षा ग्रहण करने के लिए मुम्बई विश्वविद्यालय से स्नातक तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति विषय में स्नातकोत्तर की कक्षा में प्रवेश ली। अच्छे अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण कर डां.भवालकर सन् १९४५ ई.में गोखले मेमोरियल कालेज, कलकत्ता में अध्यापन कार्य भी प्रारंभ कर दिया था।यह उनके स्त्री शिक्षा के प्रति समर्पण का प्रमाण है।उनका सागर आना तब हुआ जब उनके पति प्रो.डी.आर.भवालकर की नियुक्ति सागर विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग में हुई।इस तरह डा. भवालकर भी विश्वविद्यालय के स्थापना के समय १९४६ ई.में संस्कृत विभाग में मानद व्याख्याता के रूप में नियुक्त हो गई। विद्वत्ता और समर्पण के कारण इनकी १९५३ ई.में स्थायी व्याख्याता के रूप में कर दी गई । इस प्रकार आपको सागर विश्वविद्यालय जिसका अब डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय नाम हो गया है उसका प्रथम महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है। अध्यापन कार्य करते हुए डॉ भवालकर 'महाभारत में नारी' विषय पर पी-एच.डी.की उपाधि प्राप्त की थी।स्वतन्त्रता पश्चात संस्कृत विषय में पी-एच.डी.की उपाधि भी एक महिला के लिए गर्व की बात थी।जिसका बाद में ग्रंथाकार में प्रकाशन भी हुआ।यह ग्रंथ स्त्री विमर्श के केन्द्र में मील का पत्थर के समान आलोचक वर्ग में समादृत है। डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के अनेक गतिविधियों में डां भवालकर का योगदान अविस्मरणीय है। जिनमें उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य बालिका छात्रावास के वार्डेन पद के दायित्व का निर्वाह है। उन्होंने छात्रावास में छात्राओं की समस्या तथा उनके व्यक्तित्व को सबल एवं सशक्त बनाने में सदैव संलग्न रहा करती थी। उन्होंने स्वतन्त्रता पश्चात सागर में स्त्री शिक्षा का अलख जगाने का कार्य किया था। इसी रूप में व्यापक दृष्टिकोण के साथ उनका लेखन कार्य भी महत्वपूर्ण है। उन्हें संस्कृत, के साथ हिन्दी, मराठी, कन्नड़,जर्मन, तथा, अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था ‌।वे संस्कृत को लोकोपयोगी बनाने के पक्षधर थी। इस लिए उन्होंने विवाह, यज्ञोपवीत, जन्म दिवस आदि का मंगलाष्टक और गणेश, सरस्वती,लक्ष्मी,व्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओं पर स्तोत्र लिखा है। डॉ भवालकर ने दो संस्कृत संगीतकाएं लिखा है- रामवनगमनम् और पार्वतीपरमेश्वरीयम्। ये दोनों रचनाएं संगीत के ताल,लय, और छन्द पर आधारित हैं।जो उनके संगीत के मर्मज्ञ होने के प्रमाण स्वरूप है।रामवनगमनम् संगीतिका के ४० पद्य और पार्वती परमेश्वरीयम् संगीतिका के ६५ पद्य विविध रागों में उपनिबद्ध है। जिसे बड़े सहज रूप में गाया जा सकता है ‌। इन्ही विशेषताओं के कारण डॉ.भवालकर को साहित्य एवं संगीत की अनन्य उपासिका कहा जाता है। इनके रूपक साहित्य के क्षेत्र में दो एकांकी नाटक-पाददण्ड: और अन्नदेवता। गीतनाट्य- सीताहरणम् तथा अनुदित नाट्य के रूप में दीपदानम् का बड़ा नाम है। डॉ वनमाला भवालकर ने द्रोपदी गद्य काव्य लिखकर अपने को गद्य विधा से अछुता नहीं छोड़ा है। इन्होंने प्रेमोपहार: ,शुभाशीर्वचनम्, संस्कृत दिवस समारोह:,गौरोहरि: आदि संस्कृत कविताएं भी लिखा है।इनकी अनेक रचनाएं अभी भी अप्रकाशित हैं। इस प्रकार निरन्तर संस्कृत साहित्य-संगीत का उन्नयन करते हुए विश्वविद्यालय सेवा से रीडर पद पर कार्य करते हुए १९७६ ई. सेवा निवृत्त हो गयी। उन्हें अध्यापन व कार्यशैली के कारण विश्वविद्यालय द्वारा दो साल के लिए एक्सटेंशन भी दिया गया था।इस प्रकार डॉ भवालकर केवल विश्वविद्यालय सेवा से निवृत्त हो गई न कि लेखन और सामाजिक कार्यों से। वे अवकाश प्राप्त के बाद भी संस्कृत साहित्य, संगीत एवं भारतीय संस्कृति के उत्थान के साथ साथ स्त्री शिक्षा के उन्नयन के लिए लगातार कार्य करती रही। उन्होंने अपने जीवन में किसी कार्य को असम्भव नहीं माना। लेखन उनके जीवन की पूंजी थी। जिसके लिए उन्हें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से अनेक पुरस्कार भी दिए गए हैं।उनका हिन्दी नाटक 'उधार का पति' अपने समय का बहुत लोकप्रिय नाटक है।इसका मंचन सम्पूर्ण भारत में किया जा चुका है।वनमाला भवालकर ने 'संसाराचा सारीपाट' तथा 'मीतु झा आहे' नामक दो मराठी नाटक भी लिखा है ।'ओमेन इन द महाभारता 'एवं 'इमनेंट ओमेन इन द महाभारता' नामक दो ग्रंथ की रचना इन्होंने अंग्रेजी भाषा में किया है। डा. भवालकर के सम्पूर्ण व्यक्तित्त्व पर संस्कृत विभाग डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय से डा.देवेन्द्र प्रसाद तिवारी पी -एच.डी उपाधि भी प्राप्त की है | वानमाला भावालकर की प्रेम नारायण द्विवेदी ,राधाबल्लभ त्रिपाठी ,कुसुम भूरिया दत्ता आदि जैसी शिष्य परम्परा भी रही है | इस तरह निरन्तर विना थके -हारे मां भारती की उपासना करने वाली डॉ भवालकर अपने जीवन के अन्तिम अवस्था में कैंसर जैसे असाध्य विमारी से पीड़ित होने के कारण इन्दौर में ३०जुलाई २००३ ई.को अपनी भोतिक शरीर को छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए यश:शरीर में विलीन हो गयी। उन्हें जन्म जयंती पर शत शत नमन।

Thursday, 31 December 2020

मानवता के उत्कर्ष का महाग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता

मानवता के उत्कर्ष का महाग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता (गीता जयंती विशेष) २५ दिसम्बर ,.२०२० डा. संजय कुमार सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, म. प्र. मो.नो. 8989713997,9450819699 Email-drkumarsanjaybhu@gmail.com आज ही के दिन मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन द्वापर युग में भगवान् श्रीकृष्ण ने मोह- माया में फंसे हुए अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था। इसी रूप में मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को प्रत्येक वर्ष गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है।इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है।ब्रह्मपुराण और पद्मपुराण में भी इस एकादशी को अज्ञान से ज्ञान,अकर्म से कर्म और त्याग में प्रवृत्ति कराने वाला कहा गया है। इसी परिप्रेक्ष्य में श्रीमद्भगवद्गीता का महत्व बढ़ जाता है जहां आत्मोन्नति और मानव मात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता को उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र के साथ इसके आध्यात्मिक चिंतन के कारण ही रखा जाता है। इस अमरकृति का ऐसा प्रभाव है कि कुरुक्षेत्र भी जो युद्ध क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है वस धर्म क्षेत्र में परिणित हो जाता है। हमारे यहां धर्म को बहुत व्यापक अर्थ में ग्रहण किया गया है। धर्म त्याग और कर्त्तव्य की मूल भावना को जन्म देता है।जो नैतिकता को बट वृक्ष के भांति पकड़े रहे वही धर्म है। यहां धर्म का मूल आशय यही है।जो समाज को धारण करता है जिससे समाज पालित-पोषित होता है तथा जिसके बिना समाज की गति अवरुद्ध हो जाती है वही धर्म है। श्रीमद्भगवद्गीता में इसी धर्म की स्थापना की गई है जहां प्राणि मात्र के कल्याण के सभी हेतु विद्यमान हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का धर्म सम्पूर्ण प्राणियों को रक्षा और संरक्षण प्रदान करता है तथा अत्याचार,अनाचार,अन्याय,अधर्म, अनीति एवं असद्भाव का उन्मूलन कर सद्भाव में सबको प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करता है। इसका धर्म ब्रह्माण्डमय है जिसमें मनुष्य, पशु,पक्षी, वृक्ष, वनस्पति, नदी, पर्वत,पठार,सबके संरक्षण और संवर्धन की कामना की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता में न किसी पंथ,सम्प्रदाय,मत और हिन्दू, मुस्लिम,सिक्ख ,ईसाई किसी की भी न सराहना की गयी है ,न निन्दा की गयी है अपितु मानव मात्र के कल्याण और उन्नति की ही केवल बात कही गयी है। इस लिए इस अमरकृति की २००० से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसके विषय में ख्वाजा दिल मुहम्मद ने लिखा है-"रुहानि गुलों से बना यह गुलदस्ता हजारों वर्ष बीत जाने पर भी दिन दूना और रात चौगुना महकता जा रहा है।यह गुलदस्ता जिसके हाथ में गया उसका जीवन महक उठा। ऐसे गीता रूपी गुलदस्ते को मेरा सलाम है।सात सौ श्लोक रूपी फूलों से सुवासित यह गुलदस्ता करोड़ों लोगों के हाथों में गया फिर भी मुरझाया नहीं।" पाश्चात्य विद्वान विलियम वान हमबोल्ट ने गीता को किसी ज्ञात भाषा में उपस्थित गीतों में सम्भवतः सबसे अधिक सुंदर और एक मात्र दार्शनिक गीत कहा है। इन्हीं सब विशेषताओं के कारण श्रीमद्भगवद्गीता अनेक भाषाविदों को मोहित की। जिससे उर्दू आदि के लोग भी अछुते नहीं रहें। उर्दू और फारसी के विद्वानों ने भी इस ज्ञान गंगा को सहेजने के लिए अपनी भाषाओं में इसका अनुवाद किया। बता दें कि श्रीमद्भगवद्गीता का ८३ अनुवाद तो मात्र उर्दू और फारसी भाषा में किया गया है। जिसमें दारा शिकोह का फारसी अनुवाद और खलीफा अब्दुल हकीम के प्रथम उर्दू अनुवाद से कौन परिचित नहीं है।इन ८३अनुवादों में ८२ अनुवाद तो स्वतन्त्रता पूर्व के हैं जिनमें अरबी फारसी के बहुतायत शब्दों का प्रयोग किया गया है। जिसके कारण उन्हें समझने में बहुत परेशानी होती थी फलस्वरूप मशहूर शायर अनवर जलालपुरी ने १९८५ ईस्वी में गीता का उर्दू में अनुवाद किया।यह अनुवाद अवधक्षेत्र की आम बोलचाल में प्रयुक्त उर्दू के शब्दों द्वारा किया गया है जिससे यह अनुवाद बहुत अल्प समय में ही लोकप्रिय भी हो गया। श्रीमद्भगवद्गीता का अंग्रेजी भाषा भी अनेकों अनुवाद मिलते हैं। जिसमें १७८५ ईस्वी में चार्ल्स विल्किंस ने जो श्रीमद्भगवद्गीता का अंग्रेजी में अनुवाद वह बहुत महत्वपूर्ण है। यह किसी योरोपीय विद्वान द्वारा मूल संस्कृत ग्रंथ का अध्ययन करके किया जाने वाला पहला अंग्रेजी अनुवाद है।इसी अनुवाद के द्वारा पश्चिमी देशों में भारतीय चिन्तन और मनन की श्रेष्ठता का ज्ञान हो सका था। श्रीमद्भगवद्गीता सदैव मनुष्य में उच्च विचार और कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देती है। उसमें सभी धर्म के मूल भाव समाहित हैं। सभी मानव समान हैं।न कोई बड़ा है न कोई छोटा।न कोई गरीब है और न कोई अमीर। सभी उसके अपने हैं कोई पराया नहीं है। सभी उसके लिए प्रिय हैं। सभी मनुष्य उसी से उत्पन्न हुए हैं-यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्माणां तमभ्यर्च्यसिद्धिं विन्दति।। अर्थात् उसी परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और उसीसे यह समस्त जगत व्याप्त है।उस परमेश्वर की स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। पुनः आगे कहा गया है कि प्राणियों के हृदय में वही ईश्वर सदैव स्थित रहता है-ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया।। अर्थात हे अर्जुन शरीर रूपी यन्त्रों मेंआरूढ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनकेे कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों को हृदय में स्थित रहता है।यह बहुत महत्वपूर्ण बात आज के सन्दर्भ में कही गयी है। मनुष्य की शरीर तो यन्त्र के समान है। यन्त्र आज है कल नहीं रहेगा लेकिन उसमें जो ईश्वरीय तत्व है और जो उसका समानता का भाव है वही शाश्र्वत है।वह एक होते हुए भी सबमें है। इसलिए मानव मानव में भेद कैसा? सभी उसी से उत्पन्न हुए हैं। सभी में वही है।इस लिए सभी एक हैं। किसी में भेद नहीं है ।सब अभेद हैं उस परमात्मा का ही अंश हैं- ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। इस देंह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है।जो पांच इन्द्रियों और मन को आकर्षित करने वाला है। यहां आत्मा और परमात्मा का एकीकरण किया गया है।यह श्रीमद्भगवद्गीता अनेकता में एकता की बात करती है।यह मानव मात्र के कल्याण का विधान करती है। सज्जन लोगों का उद्धार करना ही इसका लक्ष्य है। सम्पूर्ण मानवता को सुदृढ़ बना कर एक स्वस्थ समाज की स्थापना ही इस महाग्रंथ की मूल भूमि है। यहां जाति, संप्रदाय , मित्र,शत्रु के भाव से ऊपर उठकर मानव मात्र के अभ्युदय की कामना की गयी है। इसके विषय में पं.मदन मोहन मालवीय ने कहा है कि "सम्पूर्ण भूमण्डल की प्रचलित भाषाओं में श्रीमद्भगवद्गीता के समान लघु आकार में इतना विपुल ज्ञानपूर्ण कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है।" मैं यहां एक बात और स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि भाषाओं का न कोई धर्म होता है और न जाति। भाषा तो मात्र अभिव्यक्ति की माध्यम होती है। भाषा से ही सम्पूर्ण जगत प्रकाशित है। श्रीमद्भगवद्गीता संस्कृत में लिखी गई है इसलिए वह केवल हिन्दू धर्म ग्रंथ है ऐसा नहीं माना जाना चाहिए। वह सबके लिए है और सब लोग उसके अपने हैं। वह तो सार्वकालिक,सार्ववर्णिक सबमें समानता संस्थापक महाग्रंथ है।

Friday, 7 August 2020

संस्कृत केवल भाषा नहीं जीवन दृष्टि है -डॉ संजय कुमार, सहायक आचार्य ,संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, म.प्र. ,drkumarsanjaybhu@gmail.com Mo.No.8989713997

भारत में प्रत्येक वर्ष स्रावण पूर्णीमा के दिन संस्कृत दिवस मनाया जाता है।जिसका प्रारम्भ सन् 1969 ई.के भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उस आदेश से प्रारंभ हुआ जिसमें केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर संस्कृत दिवस मनाने का निर्देश पारित किया गया था।इस निर्देश में स्रावण पूर्णीमा को ही संस्कृत दिवस के रूप में स्वीकार किया गया क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इसी दिन से प्राचीन भारत में नया शिक्षा सत्र प्रारंभ होता था। गुरुकुल में विद्यार्थी इसी दिन से अध्ययन प्रारंभ करते थे जो पौष मास के पूर्णीमा तक चलता था। फलत:स्रावण मास की पूर्णिमा ही संस्कृत दिवस के लिए उपयुक्त मानी गयी। संस्कृत दिवस या संस्कृत सप्ताह मनाने का उद्देश्य संस्कृत भाषा के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के साथ उसे संरक्षण एवं संवर्धन प्रदान करना है।यह इस लिए आवश्यक है क्योंकि संस्कृत भाषा से ही सभी भारतीय भाषाएं उत्पन्न हुई हैं।प्राकृत,पालि, अपभ्रंशादि के साथ अन्य हिन्दी, बंगला, मराठी, गुजराती, तेलगु आदि भाषाएं संस्कृत से ही निकली हुई हैं। पाणिनि व्याकरण की सर्वमान्यता के कारण इस देश की समस्त भाषाओं ने संस्कृत के वर्णक्रम को अपनाया है |फलस्वरूप संस्कृत का ब्यापक प्रसार हुआ तो उसने देश की अन्य भाषाओँ को आत्मसात कर प्रभावित किया और अपने शव्द भंडार को समृद्ध किया जिसका परिणाम यह हुआ कि कन्नड़ और तेलगु में लगभग ७० प्रतिशत और तमिल में ६० प्रतिशत शब्दवाली संस्कृत मूल के है | विश्व की अन्य भाषाओं पर भी संस्कृत का प्रभाव देखा जा सकता है। यह संस्कृत ही भारत की मूल भाषा है। इसी से भारत की पहचान और अस्मिता है।वस्तुत: भाषा ही वह तत्त्व है जिसके द्वारा हम अपने मनोभावों को व्यक्त करते हैं। भाषा जीवन में उस प्रकाश के समान है जिसके न रहने पर तीनों लोक घोर अन्धकार के समान है। अतः भाषाओं का संरक्षण करना मानव का परम कर्तव्य है। संस्कृत की महत्ता इस बात से भी सिद्ध होती है कि संस्कृत का सम्पूर्ण भारत के विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त दुनिया के 250 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में अध्ययन- अध्यापन होता है।इस तरह संस्कृत में रोजगार का भी बड़ा क्षेत्र है। संस्कृत पढ़कर,अध्यापक, धर्मगुरु,अनुवादक,सम्पादक, आकाशवाणी-दुरदर्शन में संबाददाता तथा प्रशासनिक सेवा में अपना योगदान दें सकते हैं साथ ही शोध के क्षेत्र में भी संस्कृत में बहुत अधिक सम्भावनाएं हैं। वैदिक, पौराणिक तथा शास्त्रीय में जीवन से जुड़ी अत्यधिक सामग्री विद्यमान है जिसे शोध के माध्यम से लोकोपयोगी बनाया जा सकता है। संगणकीय उपयोग के लिए भी संस्कृत भाषा की महत्ता दिनों-दिन बढ़ रही है। पश्चिमी संगणकशास्त्रज्ञ ऐसी भाषा के खोज के में थे जिसका संगणकीय प्रणाली में उपयोग कर उसका संसार की किसी भी भाषा में उसी क्षण रूपांतरण हो जाय उन्हें ऐसी भाषा के रूप में संस्कृत ही मिली। इन्ही सब विषयों को ध्यान में रखते हुए नई शिक्षा नीति में भी संस्कृत को विशेष महत्व दिया गया संस्कृत के महत्ता के सम्बन्ध में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरु ने कहा था –अगर मुझसे पूछा जाय कि भारत का सबसे बड़ा खजाना क्या है और श्रेष्ठतम विरासत क्या है तो असंदिग्ध रूप से यही कहुंगा कि संस्कृत भाषा और साहित्य और जो कुछ उसमें है यह उत्कृष्ट विरासत है और जब तक यह जीवित रहेगी तब तक भारत की मेधा अक्षुण रहेगी | स्व.शुषमा स्वराज ने भी कहा है कि संस्कृत में शब्दों का अपार भंडार है ,रचनाकार अपने व्यक्तित्व के अनुसार उसे चुनता है |जैसे लंका विजय के समय राम और रावण के स्तोत्रों को रामचरितमानस में लिखा गया है लेकिन दोनों अपने स्वभाव के अनुसार शब्द प्रयोग किये है जिससे उनमे पर्याप्त अंतर दिखलाई पड़ता है | संस्कृत के विषय में कहा जाता है किभारत की डी प्रतिष्ठाएं हैं संस्कृत और संस्कृति –भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे |संस्कृतं संस्क्रितिश्च | यह संस्कृत की महत्ता का सर्वकालिक और आधिकारिक बयानहै | भारत का संस्कृत से सम्बन्ध शारीर और आत्मा का है| दोनों एक दूसरे के विना निष्प्राण है| संस्कृत भाषा की ऐसी विशेषता है कि इसमें लिखे या सुनें हुए शब्दों का अर्थ न समझने पर भी उसके चैतन्यता एवं सात्विकता का बोध होने लगता है।इसके शब्द माधूर्य से मन मस्तिष्क पुलकित हो उठता है।भाषा वैज्ञानिकों का मानना है कि निरुक्त इत्यादि संस्कृत ध्वनि विज्ञान की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं| इन सबसे भिन्न संस्कृत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी जीवन दृष्टि है।यह थके हारे समाज को एक दृष्टि प्रदान करती है जिसका परिणाम सुखद और निरापद होता है। संस्कृत भारतीय साहित्य व समाज के भव्य विचारों का दर्पण है। यहां जीवन निर्वाह के लिए शास्त्र और साहित्य का मधुर सामंजस्य स्थापित है। भारतीय समाज का मेरुदण्ड गृहस्थ आश्रम को माना जाता है जिसे संस्कृत काव्यों में भली भांति स्वीकार भी किया गया है। संस्कृत ही गार्हस्थ्य धर्म की सांगोपांग व्याख्या करती है। वेद,वेदांग ,उपनिषद ,सांख्य,योग,न्याय ,वैशेषिक , मीमांसा, वेदान्त आदि दर्शन मूल रूप से संस्कृत में ही विद्यमान हैं। धर्मशास्त्र हमारे जीवन का व्यवहार शास्त्र है वह भी संस्कृत में भी है। अतः इन्हें जानने समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है। संस्कृत ही समाज के आचरण और व्यवहार को अनुशासित करती है। संस्कृत साहित्य का आद्य महाकाव्य वाल्मिकीय रामायण गार्हस्थ्य धर्म की धुरी पर घूमता है। यहां महाराज दशरथ क पितृत्व, कौशल्या का आदर्श मातृत्व, सीता का सतीत्व,भरत और लक्ष्मण का त्याग, सुग्रीव की मित्रता,और सबसे अधिक रामचंद्र का आदर्श पुत्रत्व भारतीय गृहस्थ जीवन के चरम सीमा के रूप में वर्णित है।इन सबकी अभिव्यक्तियों से संस्कृत वाड़्मय चमत्कृत हो जाता है। वहीं महाभारत भी धर्म विजय के लिए प्रसिद्ध है। इसी रूप में कालिदास,माघ,भारवि, भवभूति,श्रीहर्ष, के विमल काव्यों से अभिनव एवं शुभ आचरण-व्यवहार की सीख मिलती है। जिसका प्रभाव स्वर्गीय सुखों से मानव मन पर कम नहीं पड़ता है। संस्कृत भाषा व साहित्य के साथ हमें अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र के साथ ही साथ आयुर्वेद, और योग को वरदान स्वरूप प्रदान करती है।आज कोरोना काल में आयुर्वेद और योग ही हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का एक मात्र आश्रय बना हुआ है। राष्ट्रीय भावना, पर्यावरण,विश्वबन्धुत्व की भावना से आज सम्पूर्ण विश्व संस्कृत के ज्ञान गरिमा से प्रभावित है। संस्कृत हमारे लोक जीवन के समीप की भषा है जहाँ वैदिक युग से ही लोकजीवन की सम्बेदना और जीवन दशा का चित्रण मिलता है |कालिदास ,बाणभट्ट ,दण्डी आदि ऐसे कवियों के रचनाओं में हमारे लोक जीवन ली स्पष्ट झलक मिलतीहै |इसलिए संस्कृत को केवल कर्मकांड की भाषा कहना उचित नहीं है |कर्मकांड का संस्कृत में क्षेत्र तो लगभग दो प्रतिशत ही होगा शेष तो शास्त्र ,साहित्य और समाज से भरा पड़ा है | तत्त्वज्ञान और यथार्थ पर आधारित भारतीय दर्शन का मूल स्रोत संस्कृत ही है। जहां आत्मा और व्रह्म का विलक्षण प्रतिपादन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता व्रह्मसूत्र, विष्णुसहस्त्रनाम,अनुगीता, भीष्मवस्तराज, गजेन्द्रमोक्ष जैसे आध्यात्मिक तथा भक्ति परायण ग्रन्थों से भला कौन परिचित नहीं है।जिसके आध्यात्मिक ताना बाना में सम्पूर्ण व्रह्माण्ड समाहित है। संस्कृत को धर्म निरपेक्ष भाषा भी का सकतें है |अकबर के समय में अल्लोपनिषद की रचना की गयी थी |दाराशिकोह और अब्दुर्रहमान खानखाना जैसे मुग़ल सामंतों ने वेड ,उपनिषद और श्रीमद्भागवद्गीता का अनिवाद संस्कृत में कराया |खानखाना तो संस्कृत के अच्छे कवि बजी थे | उन्होंने खेद्कौतुकम जैसे ग्रन्थ का प्रणयन संस्कृत भाषा में किया है |उनका लिखा हुआ गंगाष्टकं तो संस्कृत उत्कृष्ट रत्न है | संस्कृत भाषा को दैवी भाषा कहने का उद्देश्य भी यही है कि इससे दिव्यता प्रकट होती है।यह बुद्धि एवं विचार को शुद्ध रखने वाली भाषा है।यह भेद नहीं अभेद की बात करती है यह केवल शास्त्रीय रूप से ही समृद्ध नहीं है बल्कि मनोरंजनात्मक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां पंचतंत्र, हितोपदेश, तथा कथासरित्सागर जैसे कथा ग्रंथ हैं।कादम्बरी और दशकुमारचरित के अनेक पक्ष मानव मन को रंजित करते हैं। यहां अभिज्ञानशाकुन्तल और उत्तररामचरित भी हैं जो थके -हारे मानव के लिए आश्रय स्थल हैं।यह संस्कृत सबके सुख और कल्याण का विधान करती है इसमे कही भी द्वेष, घृणा आदि का भाव नहीं है।इस लिए सम्पूर्ण मानव जाति का यह कर्त्तव्य है कि सभी लोग संस्कृत को अपनाएं और अपने जीवन का नव निर्माण करें।

Tuesday, 27 August 2019

पंचतन्त्र के राजधर्म की प्रासंगिकता

पंचतन्त्र के राजधर्म की प्रासंगिकता



      संस्कृत साहित्य विश्वसाहित्य परम्परा की अमूल्य निधि है। यह साहित्यिक मीमांसा के साथ-साथ सांस्कृतिक तत्त्वों के स्वरूप परंपरा का भी उन्नामक साहित्य है। इसमें सांस्कृतिक मूल्यों को केवल संरक्षित ही नहीं किया गया है अपितु उनको शाश्वत धर्म के रूप में स्थापित किया गया है। संस्कृत साहित्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, धर्म-दर्शन, उत्सव-महोत्सव, उपदेश एवं राजधर्म आदि विषयों का समावेश प्राचीन समय से ही मिलता रहा है। जिसमें पंचतन्त्र का स्थान महत्त्वपूर्ण है। पंचतन्त्र-मित्रभेद, मित्रलाभ, सन्धिविग्रह, लब्धप्रणाश तथा अपरीक्षितकारक इन पांच तन्त्रों से सम्मिलित ग्रन्थ का नाम है। प्रत्येक तन्त्र में मुख्य कथा एक ही है जिसके अंग को पुष्ट करने के लिए विविध गौण कथाएँ कही गयी हंै। लेखक का उद्देश्य आरम्भ से ही सदाचार, नीति और राजधर्म के विविध पक्षों का उद्घाटन करना रहा है। विशेषकर राजधर्म ही पंचतन्त्र का मूल प्रतिपाध विषय है क्योंकि महिलोरोप्य के राजा अमरकीर्ति के पुत्रों को सुशिक्षित करने के लिए पंचतन्त्र की रचना विष्णुशर्मा ने किया था। विष्णुशर्मा के उपदेश शैली का ऐसा प्रभाव राजकुमारों पर पड़ा कि वे बहुत अल्प समय में ही व्यवहार कुशल, सदाचारी और राजधर्म के ज्ञाता बन गये।1

      पंचतन्त्र ऐसा ग्रन्थ है जिसमें पशु-पक्षियों के आधार पर राजकुमारों को उपदेशित किया गया है। पशु-पक्षी सामान्य जनमानस केन्द्रस्थल हैं। इसलिए पंचतन्त्र लोक का प्रतिनिधित्व करता है और लोक सदैव प्रासंगिक ही होता है। वैसे तो सभी साहित्य समाज के दर्पण हैं लेकिन उनमें भी पंचतन्त्र समाज के अधिक समीप है। पंचतन्त्र की कथाए भारतीय परम्परा की समृद्ध धरोहर हैं। यह युगों-युगों से मानव समाज को प्रकाशित कर रहा है। उचित-अनुचित का विवेक उत्पन्न कर पीढ़ी दर पीढ़ी ने आने वाली संतानों के लिए दुर्लभ ज्ञान पेटिका को सौंपने वाला ग्रन्थ पंचतन्त्र है।

      अनादिकाल से ही राष्ट्र के हितैषी-मनीषियों द्वारा राजधर्म का उपदेश दिया जाता रहा है। इसी रूप में पंचतन्त्र भी प्रसिद्ध है। राजव्यवस्था का उचित नियम राजधर्म कहलाता है। राजधर्म को सभी धर्मों का मूल कहा गया है। इसीलिए राजधर्म के लिए दण्डनीति, क्षत्र विद्या, नृपशास्त्र, राजशास्त्र, राजनीति आदि नामों का प्रयोग किया जाता है। इसकी प्रासंगिकता एवं उपादेयता का ज्ञान इसी से हो जाता है कि इसके विषय वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतिग्रन्थ, महाकाव्य, नाटक आदि में प्रतिपादित हैं। यहाँ तक कि आधुनिक संस्कृत काव्य लेखक, रामजी उपाध्याय, सत्यव्रत शास्त्री, अभिराजराजेन्द्र मिश्र, पण्डिता क्षमाराव एवं राधावल्लभ त्रिपाठी आदि भी राजधर्म की महत्त्वशीलता को देखते हुए इसे व्याख्यापित किये हैं। इस प्रकार राजधर्म की समुचित व्याख्या संस्कृत साहित्य में प्राप्त होती है।

      स्मृतियों को धर्म शास्त्र की संज्ञा दी जाती है एवं राजधर्म को धर्मशास्त्र का एक अंग माना जाता है। जिससे विदित होता है कि धर्मशास्त्र सामान्य धर्माचरण से भिन्न राजा के आचरण को भी धर्माचरण मानता है। ठीक ही कहा गया है- धारणाद् धर्ममित्याहु।2 से राजधर्म के समुचित पालन से ही राजा, प्रजा एवं राज्य को धारण करता है। राजा ही राज्य एवं प्रजा दोनों का भाग्य विधाता होता है। राजा के सभी कार्य का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से दोनों पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए राजा को प्राण-पण से प्रजा का पालन करना चाहिए। आज इस प्रजातन्त्र के युग में राजा शब्द का प्रयोग नहीं मिलता है। आज वह प्रशासन के रूप में व्यवहृत है। समकालीन समय का अनुशासन जनता के प्रतिनिधियों के हाथ में है लेकिन कार्यप्रणाली में जनता का योगक्षेम ही मूल है।

      पंचतन्त्र को अर्थशास्त्र एवं नीतिशास्त्र के समान माना जाता है इसमें वर्णित राजधर्म के विचार भलि-भांति राजनीतिक व्यवस्थाओं का विश्लेषण करता है। पंचतन्त्र में विष्णुशर्मा की मौलिक कल्पना ही नहीं है बल्कि रामायण, महाभारत, पुराण और धर्मशास्त्र ग्रन्थों के राजधर्म से अनुप्राणित भी है। इसका प्रमाण पंचतन्त्र में मंगलाचरण के रूप में अनेक ऋषियों का नमस्कार हैं।3 यहाँ भी राज्यांग के रूप में प्राचीन परम्परा का अनुसरण करते हुए सात अंगों की बात कही गयी है जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी प्राचीनकाल में रही है। ये सात अंग हैं- स्वाम्यमात्यजनपददुर्ग कोश दण्डमित्राणि प्रकृतयः।4

      अर्थात् स्वामी अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड, मित्र। आज भी भारतीय शासन व्यवस्था का कार्य नवीन नाम से इसी रूप में संचालित होता है। कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका का जो कार्य दर्शाया गया है वह प्राचीन सप्तांग से ही सम्बन्धित है। ‘पंचतन्त्र’ में दक्षिणात्य जनपद के राजा महिलारोप्य के राजा अमरशक्ति के परिचय से ही स्वामी का लक्षण स्पष्ट हो सा रहा है- तत्र सकलार्थिकल्पद्रुमः प्रवरमुकुटमणिमरीचिम´्री चर्चित चरणयुगलः सकलकलापारङ्गतोऽमरशक्तिर्नाम राजा बभूव।5

      अर्थात महिलारोप्य नगर के समस्त याचकों के लिए कल्पवृक्ष के समान, उच्चतम राजाओं की मुकुटमणियों के किरण समूह से पूजित चरणयुगल वाला और समग्र कलाओं का पारदर्शी अमरशक्ति नाम के राजा थे। राजा का कल्पवृक्ष के समान होना और सम्पूर्ण कलाओं को जानने वाला होना अपने आप में राजा का महान् गुण है। कहने का भाव यह है कि राजा प्रजापालक के साथ-साथ शास्त्रों का ज्ञाता रहे। उसे लोक और शास्त्र दोनों का ज्ञान रहे। तभी वह सम्यक् प्रकार से राज्य संचालन कार्य कर सकता है। राजा का वैभव प्रजा ही है। पंचतन्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि सुवर्ण, धान्य, रत्न, विविध प्रकार की सवारियाँ तथा और भी जो कुछ राजा के पास है वह सब उसे प्रजा से ही प्राप्त होता है।6 इसलिए राजा को प्रजापालन में दत्तचित्त होना चाहिए-

फलार्थी नृपतिर्लौकन्पालयेद्यत्नमास्थितः।

दानमानादितोयेन मालाकारोऽङ्कुरानिव।।

लोकानुग्रहकर्तारः प्रवर्धन्ते नरेश्वराः।

लोकानां संक्षयाच्चैव क्षयं यान्ति न संशयः।।7

      अर्थात् फल चाहने वाले राजा को चाहिए कि जैसे माली अंकुरों को सींचता है वैसे ही वह दान-सम्मान आदि रूपी जल से उद्योगपूर्वक प्रजा का पालन करे। प्रजा पर कृपा करने वाले राजाओं की वृद्धि होती है और प्रजा को कष्ट देने वाले राजा निस्संदेह नष्ट हो जाते हैं। ‘पंचतन्त्र’ की यह पंक्ति प्रजातन्त्र में अक्षरसह सत्य सिद्ध हुई है। जो सरकार प्रजाहित को सर्वोपरि नहीं रखती है उसे प्रजा सत्ता से दखल कर देती है। इसलिए सत्ताधारी को प्रजापालन में तत्पर रहना चाहिए। ‘मनुस्मृति’ में भी कहा गया है-

मोहाद्् राजा स्वराष्ट्रं कर्षयत्यनवेक्षया।

सोऽचिराद् भ्रश्यते राज्याज् जीविताच्च सबान्धवः।।8

      अर्थात् जो राजा अज्ञानवश अपने राष्ट्र का देखभाल नहीं करके उसको कष्ट देता है। वह राजा शीघ्र ही राज्य से भ्रष्ट होता है और बन्धु-बान्धवों के साथ जीवन से भी हाथ धो बैठता है।

      राज्य के सात अंगों में राजा के पश्चात् द्वितीय महत्त्वपूर्ण अंग अमात्य का है। शासन की समस्त व्यावहारिकता मन्त्री के संकेत पर ही निर्भर करती है। मंत्री के लिए सचिव, अमात्य शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। ‘कौटिल्य’ के अनुसार राजत्त्व पद के लिए सहायकों महती आवश्यकता होती है। रथ का केवल एक चक्र गतिमान नहीं हो सकता है। इसलिए राजा को चाहिए कि वह मन्त्रियों का नियुक्त करे और उनके परामर्श को माने।9 ‘पंचतन्त्र’ में मन्त्री के सम्बन्ध में कहा गया है-

अन्तः सारैरकुटिलैरच्छिद्रैः सुपरीक्षितैः।

मन्त्रिभिर्धार्यते राज्यं सुस्तम्भैरिव मन्दिरम्।।10

      अर्थात् जिस प्रकार अच्छे, पुष्ट, सीधे खम्भों के सहारे मन्दिर खड़े रहते हैं उसी प्रकार सावधान, निष्कपट, निर्दोष, ठीक प्रकार से परीक्षित मन्त्रियों द्वारा राज्य धारण किया जाता है। यहाँ पर मन्त्री की विविधता प्रतिपादित है। मन्त्री के कत्र्तव्य को बताते हुए ‘पंचतन्त्र’ में कहा गया है-

अशृण्वन्नपि वोद्धव्यो मन्त्रिभिः पृथिवीपतिः।

यथा स्वदोषनाशाय विदुरेणाम्बिकासुतः।।11

      अर्थात् राजा यदि न सुने तो भी मन्त्री का कत्र्तव्य है कि वह राजा को समझाये। जिस प्रकार अपना दोष दूर करने के लिए विदुर ने धृतराष्ट्र को समझाया था। विदुर सदैव धृतराष्ट्र के दोषों का विरोध अपना कत्र्तव्य समझकर करते थे। राजा मन्त्री के परामर्श को अस्वीकार करता है तो भी मन्त्री को अपने परामर्श का त्याग नहीं करना चाहिए। इसलिए राजा को योग्य मन्त्रियों की नियुक्ति करनी चाहिए एवं उनके परामर्श को मानना चाहिए।

      राजा सप्ताङ्गों में जनपद तृतीय स्थान पर आता है। जनपद ही वर्तमान समय में राष्ट्र है, राष्ट्र मातृभूमि है। जिसके सम्बन्ध में ‘अथर्ववेद’ में कहा गया है- माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।12 अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। पुनः वही कहा गया है- यस्यां गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां मत्र्या व्येलवा।13 अर्थात् सम्पूर्ण भूमि के लोग प्रसन्न हो, उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो। आचार्य मनु भी अपने ग्रन्थ ‘मनुस्मृति’ में एक सुरक्षित राष्ट्र की कामना करते हुए कहते हैं-

राष्ट्रस्य संग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत।

सुसंग्रहीत राष्ट्रो हि पार्थिवः सुखमेधते।।14

      अर्थात् राजा राष्ट्र की रक्षा के लिए सदैव उपाय करता रहे। जो राजा अपने राष्ट्र की ठीक प्रकार से रक्षा करता है वही सुखी रहता है। राष्ट्र की अवधारणा अग्निपुराण, याज्ञयवल्क्यस्मृति, कामन्दकीय नीतिसार एवं अर्थशास्त्र आदि में भी प्रतिपादित है। राष्ट्र के सम्बन्ध में ‘अर्थशास्त्र’ में कहा गया है- ‘‘राजा को ग्रामों का मण्डल, प्राचीन ढूहो या नवीन स्थानों पर बनवाना चाहिए। जिसमें अन्य देशों के लिए प्रेरित किये जाये। जहाँ राष्ट्र के अधिक संख्या वाले स्थानों से लोग बुलाकर बसाये जाये।’’15 पंचतन्त्र में राष्ट्र के लिए जनपद शब्द का स्पष्टतः उल्लेख किया गया है-

अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम्।16

      ‘पंचतन्त्र’ में सर्वत्र राज्य रक्षा की बात कही गयी है। अपने राज्य की रक्षा करना ही राजा का प्रथम कत्र्तव्य है। इस विषय में कहा गया है-

स्वस्थानं सुदृढ़ं कृत्वा शूरैश्चातैर्महाबलैः।

पददेशं ततो गच्छेत्प्रणिधित्याप्तमग्रतः।।17

      अर्थात् महाबली और विश्वस्त शूर पुरुषों के द्वारा अपने राज्य की रक्षा का प्रबन्ध करके प्रथम से ही अपने गुप्तचरों से परिपूर्ण शत्रु देश में जाना चाहिए। राज्य बहुत व्यापक शब्द है। इससे केवल भूभाग नहीं सम्बन्धित है बल्कि उस भूभाग पर बसे मानव संसाधन एवं प्राकृतिक संसाधन सब राज्य है। राज्य की सीमा रक्षा के साथ-साथ प्रजापालन इत्यादि भी राजकीय कार्य है। राज्यरक्षा के लिए राजा को शत्रु का मर्दन करना ही धर्म है। ‘पंचतन्त्र’ में कहा गया है-



रिपुरक्तेन संसिक्ता तत्स्त्रीनेत्राम्बुभिस्तथा।

न भूमिर्यस्य भूपस्य का श्लाघा तस्य जीविते।।18

      अर्थात् जिस राज्य की भूमि शत्रुओं के रुधिर और उनकी स्त्रियों के आसुओं से नहीं सींची जाती उस राजा के जीवित रहने में क्या प्रशंसा है। यानि कुछ भी नहीं उसका समाप्त होना ही श्रेष्ठ है। राजा को शत्रु की उपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए।

      राजधर्म की व्याख्या में दुर्ग का भी अत्यधिक महत्त्व है। प्राचीन युद्ध परम्परा में दुर्ग को जीतना ही राज्य पर अधिकार समझा जाता था। इसलिए प्रत्येक राज्य की दुर्ग सुरक्षा व्यवस्था उत्तम प्रकार की होती थी। ‘याज्ञवल्क्यस्मृति’ मंे दुर्ग के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कहा गया है-

रम्यं पराव्यमाजीव्यं जाङ्गलं देशमावसेत्।

तत्र दुर्गाणि कुर्वीत जनकोशात्मगुप्तये।।19

      अपने जन, कोश तथा अपने शरीर की रक्षा के लिए राजा को दुर्ग बनाना चाहिए जो रमणीय हो, पशुओं को पालने योग्य हो, साथ-साथ आजीविका का साधन भी हो और जंगल में हो। इसी महत्दृष्टि के कारण ‘पंचतन्त्र’ में भी दुर्ग के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है-

दँष्ट्राविरहितो नागो मदहीनो यथा गजः।

सर्वेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः।।20

      अर्थात् जिस प्रकार दाढ़ो के बिना सांप और मद से रहित हाथी ये दोनों सबके वश में हो जाते हैं उसी प्रकार दुर्गहीन राजा सबके वश में हो जाता है। दुर्ग की महत्ता प्रतिपादित करते हुए ‘विष्णुशर्मा’ ने कहा है कि जो कार्य हजारों हाथियों और लाखों घोड़ों से भी सिद्ध नहीं होता है राजाओं का वह कार्य एक दुर्ग से सिद्ध हो जाता है। किले में रहने वाला एक धनुर्धारी भी सैकड़ों पर निशाना लगा सकता है। इसलिए नीतिशास्त्र के ज्ञाता लोग दुर्ग की प्रशंसा करते हैं।21 आज भी दुर्ग राजधानी के रूप में व्यवहृत है।

      विशाल शासन तन्त्र को कुशलतापूर्वक संचालित करने के लिए कोष की महती आवश्यकता होती है। सभी कार्य धन से ही साधित होते हैं। धन के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए ‘पंचतन्त्र’ में कहा गया है-

अशनादिन्द्रियाणीवस्युः कार्याण्यखिलान्यपि।

एतस्मात्कारणाद्वितं सर्वसाधनमुच्यते।।22

      अर्थात् जिस प्रकार भोजन करने से समस्त इन्द्रिया सबल होती हैं उसी प्रकार समस्त कार्य धन से ही सम्पन्न होते हैं, इसलिए धन सर्वसाधन कहलाता है। इस शासन तन्त्र को ठीक प्रकार से संचालित करने के लिए कर व्यवस्था लागू की जाती है। इसी से प्राप्त धन से राज्यव्यवस्था चलती है। ‘मनुस्मृति’ में भी कर व्यवस्था के अनेक नियम इसी उद्देश्य से बताये गये हैं।23 महाकवि कालिदास ने ठीक ही कहा है-

प्रजानामेव भूत्यर्थ स ताभ्यो वलिमग्रहीत।

सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रवि।।24

      अर्थात् जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल सोखता है उसका सहस्रगुना जा वरसता है। वैसे ही राजा दिलीप जो भी प्रजा से कर लेते थे वह सब अपनी प्रजा की भलाई में लगा देते थे। आज भी प्रत्येक देश में कर व्यवस्था का पालन इसी रूप में किया जाता है। लेकिन वह कर कैसा हो इस सम्बन्ध में ‘महाभारत’ में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि जिस प्रकार मधुमक्खी पुष्प को बिना पीड़ित किये मधु निकालती है, उसी प्रकार प्रजा का उत्पीड़न किये बिना राजा को कर ग्रहण करना चाहिए।25

      राज्य व्यवस्था का मेरुदण्ड दण्ड व्यवस्था है। दण्ड ही सभी पर शासन करता है। ‘मनुृस्मृति’ में दण्ड को परिभाषित करते हुए कहा गया है-

दण्डः शस्ति प्रजाः सर्वादण्ड एवाऽभिरक्षति।

दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर् वुधाः।।26

      अर्थात् दण्ड सभी प्रजाओं को कत्र्तव्याकत्र्तव्य का उपदेश देता है, दण्ड ही सभी ओर से रक्षा करता है। लोगों के सोने पर भी दण्ड जागता ही रहता है। विद्वान लोग दण्ड को ही धर्म कहते हैं। इस प्रकार दण्ड का सम्यक् पालन ही राजधर्म है।

      राजधर्म के सप्त अंगों में मित्र सबसे अन्त में आता है लेकिन यह अपने आप में विशेष महत्त्व रखता है। सभी कालखण्डों में राजनीतिक रुप से मित्र देश इत्यादि की महती भूमिका रही है। मित्र के सम्बन्ध में पंचतन्त्र में कहा गया है-

केनामृतमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम्

आपदां च परित्राणं शोकसंतापभेषजम्।।27

      अर्थात् विपत्तियों से बचाने का साधन, शोक और मानसिक ताप का औषध अमृत तुल्य ‘मित्र’ ये दो अक्षर किसने बनाया यानि प्रजापति ने बनाया है। मित्र किसे बनाना चाहिए तो इस सम्बन्ध में भी पंचतन्त्रकार निर्देश करते हुए कहते हंै कि धनधान्य से पूर्ण रहते हुए समझदार मनुष्यों को मित्र बनाना चाहिए। देखों जल से परिपूर्ण समुद्र चन्द्रमा के उदय की प्रतिक्षा करता है।28 इन्हीं सप्तांग में राज्य सुख विराजता है। इनका सम्यक प्रकार से पालन ही राजधर्म कहलाता है। इसी के राष्ट्रिय और अन्ताराष्ट्रिय व्यापकता प्रदान करने के लिए षाड्गुण्य का भी गणना राजधर्म के रूप में किया जाता है। ये षड्गुण है- सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, संश्रय। ‘पंचतन्त्र’ में सन्धि के अनेक नियम बतलाए गये हैं। सामान्यतः अपने से बलशाली राजा से मिलना ही सन्धि है। विष्णुशर्मा कहते हैं-

वैरिणा न हि संदध्यात्सुश्लिष्टेनापि संधिना।

सुतप्तमपि पानीयं शमयत्मेव पावकम्।।29

      अर्थात् अच्छी प्रकार सन्धि करने वाले भी अथवा सन्धि के द्वारा भी शत्रु के साथ मिलन करे। देखो, पानी अत्यन्त गरम होने पर भी अग्नि को बुझा ही देता है। शत्रु पर आक्रमण करना विग्रह है। अभिष्ट सिद्ध न होने पर उसको सिद्ध करने के लिए शत्रु पर आक्रमण करना यान है। अपनी रक्षा तथा शत्रु में फूट डालने की इच्छा से उचित स्थान पर रुके रहना आसन है। द्वैधीभाव दो शत्रुओं के बीच अपने को वाणी से समर्पित करना और मनःस्थिति को समझाना तथा फूट डालने से सम्बन्धित है। पंचतन्त्र में द्वैधीभाव के सम्बन्ध में कहा गया है-

अविश्वासं सदा तिष्ठेत्सन्धिना विग्रहेण च।

द्वैधीभावं समाश्रित्य पापशत्रौ बलीयसि।।30

      अर्थात् दुष्ट शत्रु के बलवान होने पर नीतिज्ञ पुरुष उसका विश्वास न करते हुए द्वैधीभाव के द्वारा यानि कभी सन्धि और कभी युद्ध का अभिनय करें। जब दो बलवान शत्रु आक्रमण के लिए तत्पर हो तो उसे उस समय अधिक बलवान् शत्रु का आश्रय लेना  संश्रय कहलाता है। इन छः गुणों संयुक्त राजा होता है। वही राजा राज्य की व्यवस्था का ठीक प्रकार से संचालित करने में सक्षम माना जाता है। ‘पंचतन्त्र’ में तीर्थ शब्द का नाम आया है। यह तीर्थ शब्द बहुत ही पारिभाषिक शब्द है। यहाँ पर वह राजधर्म का प्रतिनिधित्त्व करता है। राजधर्म में तीर्थ का तात्पर्य राजपुरुष से है। ‘पंचतन्त्र’ में इसके सम्बन्ध में कहा गया है- तीर्थ शब्दे नायुक्तकर्माभिधीयते। तद्यदि तेषां कुत्सितं भवति तत्स्वामिनोऽभिघाताय, यदि प्रधानं भवति तद्वृद्धये स्यादिति।31

      अर्थात् तीर्थ शब्द से राजकार्य में नियुक्त पुरुष अभिप्रेत है। यदि वह तीर्थ शत्रुपक्ष में मिला हुआ विश्वासघाती है तो वे स्वामी के विनाश का कारण होता है और यदि वही श्रेष्ठ हो तो उन्नति का कारण बनता है। इसलिए राज्य को तीर्थों के विषय में जानना आवश्यक है। जिसके सम्बन्ध में कहा गया है-

यस्तीर्थानि निजे पक्षे परपक्षे विशेषतः।

गुप्तैश्चारैर्नृपो वेत्ति न स दुर्गतिमाप्नुयात्।।32

      अर्थात् जो राजा गुप्तचरों द्वारा अपने पक्ष के तथा विशेषकर शत्रु पक्ष के तीर्थों (राजपुरुषों) को जानता है वह दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है। यहाँ पर यह भी बताया गया है कि शत्रु पक्ष में 18 तीर्थ और अपने पक्ष में 15 तीर्थ होते हैं।33 शत्रुपक्ष के तीर्थ हैं- मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, द्वाररक्षक, अन्तःपुररक्षक, प्रशासक, मालगुजारी एकत्र करने वाला, पुरुषों का परिचय कराने वाला, न्यायाध्यक्ष, प्रजा की सूचनाओं अथवा आवेदन पत्र को राजा को बताने वाला (पेशकार), सेना का मुख्य अधिपति, हस्ति विभाग का अध्यक्ष, खजांची, किले का अधिकारी, करपाल, सीमापाल और प्रिय भृत्य। इनको कोई भी राजा अपनी ओर यदि मिला लेता है तो शत्रु राजा शीघ्र ही वश में हो जाता है। पंचतन्त्र में अपने तीर्थ के विषय में भी बताया गया है, ये हैं- राजपत्नी, राजमाता, अन्तपुर में रहने वाला वृद्ध ब्राह्मण, माली, शय्यारक्षक, गुप्तचरों का अध्यक्ष, ज्योतिषी, वैद्य, जल लाने वाला, पानदान ले चलने वाला, आचार्य, अंगरक्षक, राजमहल का रक्षक, छत्रधर, वेश्या। इनकी शत्रुता के द्वारा अपने वर्ग का विनाश हो जाता है। इसलिए पंचतन्त्र में कहा गया है-

वैद्यसांवत्सराचार्याः स्वपक्षेऽधिकृताश्चराः।

तथाऽऽहितुण्डिकोन्मत्ताः सर्व जानन्तिशत्रुषु।।34

      अर्थात् अपने पक्ष में वैद्य, ज्योतिषी और आचार्य को गुप्तचर के कार्य में नियुक्त करना चाहिए। सपेरे और उन्मत्त का वेश धारण करने वाले पुरुष शत्रुओं के सब स्थिति को जानते हंै। शत्रु भेद जानने के लिए गुप्तचर बनाना श्रेयस्कर है। इनके विषय में किसी को सन्देह नहीं होता है। इन गुप्तचरों के कत्र्तव्य के विषय में भी कहा गया है-

कृत्वाकृत्यविदस्तीर्थेष्वन्तः प्रणिधयः पद्म्।

विदाङ्कुर्वन्तु महतस्तलं विद्विषदम्भसः।।35

      अर्थात् जिस प्रकार कार्य चतुर कारीगर लोग घाटो में उतरकर गहरे जल का भी थाह पा लेते हैं इसी तरह कार्य को समझने वाले गुप्तचर मन्त्री आदि 18 तीर्थों में अपना स्थान बनाकर, शत्रु पक्ष के तीर्थ का ज्ञान प्राप्त करें। ‘पंचतन्त्र’ निश्चित रूप से राजधर्म की समुचित व्याख्या करता है। राजधर्म के अनेक पक्षों के विषय में कथा-कहानियों के माध्यम से विष्णुशर्मा ने राजकुमारों को ज्ञान दिये हैं। जिसकी प्रासंगिकता आज भी दृष्टिगोचर होती है। शत्रुओं के प्रति व्यवहार का प्राचीन काल से ही उल्लेख प्राप्त होता है। आज भी सभी देश शत्रु देशों के व्यवहार से प्रताड़ित हैं। इसलिए सभी साहित्य शत्रु के विषय में सदैव वे प्रतिकार की बात करते हैं। यहाँ कहा गया है-

शत्रोर्विक्रममज्ञात्वा वैरमारभते हियः।

स पराभवमाप्नोति समुद्रष्टिट्टिभाद्यथा।।36

      अर्थात् जो अपने शत्रु के पराक्रम को समझकर विरोध करता है वह उसी प्रकार पराजय को प्राप्त होता है जैसे टिट्टिभ से समुद्र। ‘पंचतन्त्र’ में युद्ध का भी वर्णन किया गया है-

सन्दिग्धो विजयो युद्धे जनामामिह युद्धîताम्।

उपायत्रितयादूध्र्वं तस्माद्युद्धं समाचरेत।।36

      अर्थात् इस संसार में युद्ध करने वाले पुरुषों का विजय युद्ध में अनिश्चित होता है। इसलिए साम, दाम, भेद नामक तीनों उपायों के अनन्तर युद्ध करना चाहिए। युद्ध अन्तिम विकल्प है। युद्ध से सदैव बचने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि युद्ध से जन-धन की अत्यधिक हानि ही होती है। इसीलिए आचार्यों द्वारा युद्ध को तब तक टालने का प्रयास करना चाहिए जब तक सभी उपाय समाप्त न हो जाय। लेकिन यहाँ पर युद्ध से लाभ के विषय में भी कहा गया है-



भूमिर्मित्रं हिरण्यं वा विग्रहस्य फलत्रयम्।

नास्त्येकमपि यद्येषां विग्रहं न समाचरेत।।38

      अर्थात् राज्य, मित्र और धन ये तीन युद्ध के लाभ है। यदि इनमें से एक भी न हो, एक के भी प्राप्त होने की आशा न हो, तो युद्ध न करें। राज्य, मित्र और धन किसी भी राज्य के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं इसलिए यदि इनकी प्राप्ति की सम्भावना हो तभी युद्ध के लिए प्रवृत्त होना चाहिए, अनावश्यक युद्ध से बचना चाहिए। आजकल अनेक देशों में निरर्थक रूप से तनाव उत्पन्न कर दिया जाता है जो उचित नहीं है।

      इस प्रकार हम देखते हैं कि पंचतन्त्र में राजधर्म का व्यापक वर्णन किया गया है। जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी तत्कालीन समय में थी। यहाँ पर प्रतिपादित राजा, मन्त्री, राज्य, कोश, दुर्ग, दण्ड और मित्र के साथ-साथ सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीयाव, संश्रय तथा साम, दाम, दण्ड, भेद आदि बहुत ही प्रासंगिक है। पंचतन्त्र में तीर्थ का भी वर्णन आया है जो राजपुरुष से सम्बन्धित है। यह तीर्थ राजव्यवस्था का रीढ़ है। जिसे अनिवार्य रूप से समझना चाहिए। शत्रु से सदैव प्रतिकार लेने का परामर्श पंचतन्त्र देता है लेकिन युद्ध तभी श्रेयस्कर मानता है जब युद्ध से लाभ निश्चित हो। पंचतन्त्र के राजधर्म की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि आज भी यह किसी न किसी रूप में प्रासंगिक बना ही रहता है। इसलिए हम कह सकते हैं  कि पंचतन्त्र का राजधर्म प्रासंगिक और महत्त्वशील है।  



सन्दर्भ

1.        पंचतन्त्र, कथामुखम्, श्लोक 9 के अनन्तर

2.        महाभारतं, 12/110/11

3.        पंचतन्त्र, कथामुखम्, 2- मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय।

                     चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्र कर्तृभ्यः।

4.        अर्थशास्त्र, 6/1

5.        पंचतन्त्र, कथामुखम्, श्लोक 3 के अनन्तर,

6.        वही, मित्रभेद, 247

7.        वही, मित्रभेद, 243, 248

8.        मनुस्मृति, 7/11

9.        अर्थशास्त्र, 1/7

10.      पंचतन्त्र, मित्रभेद, 137

11.      वही, मित्रभेद, 171

12.      अथर्ववेद, 12/1/12

13.      वही,

14.      मनुस्मृति, 7/113

15.      अर्थशास्त्र, 2/1

16.      पंचतन्त्र, कथामुखम्, श्लोक 3 के अनन्तर

17.      वही, काकोलूकीयम्, 39

18.      वही, 34

19.      याज्ञवल्क्यस्मृति, 1/321

20.      पंचतन्त्र, मित्रभेद, 255

21.      वही, 251-252

22.      वही, 8

23.      मनुस्मृति, 7/127-133

24.      रघुवंश, 1/18

25.      महाभारत, उद्योगपर्व, 34/17-18

26.      मनुस्मृति, 7/18

27.      पंचतन्त्र, मित्रसम्प्राप्ति, 61

28.      वही, 28

29.      वही, 31

30.      वही, काकोलूकीयम्, 61

31.      वही, 68 के अनन्तर गद्यांश

32.      वही, 67

33.      वही, 68

34.      वही, 69

35.      वही, 70

36.      वही, मित्रभेद, 337

37.      वही, काकोलूकीयम्, 12

38.      वही, 15

Sunday, 18 August 2019

नाट्यशास्त्रीय परम्परा और अग्निपुराण

नाट्यशास्त्रीय परम्परा और अग्निपुराण



      संस्कृत शास्त्र परम्परा में नाट्यशास्त्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। नाट्य का नाम सुनते ही हमारे अन्दर दृश्य भाव प्रकट होने लगता है और अपने स्वाभाविक अनुशासन को प्राप्त कर वह नाट्य रूप में परिणित हो जाता है। आचार्य अभिनव गुप्त के अनुसार नाट्यशास्त्र नट् (नमनार्थक) धातु से निष्पन्न है जहाँ पात्र अपने स्वभाव का त्याग कर पर भाव ग्रहण करे तो वह नाट्य रूप हो जाता है। वैयाकरण पाणिनि अष्टाध्यायी में लिखते हैं- ‘‘नटानां धर्म आश्रयो वा नाट्यम्’’1 नटों के धर्म या चेष्टाओं के अतिरिक्त उनके सम्पाद्य कर्म का प्रतिपादक नाट्य है। आचार्य भरत नाट्य की व्यापक चर्चा अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में करते हैं तथा उस वाक्यार्थ को अभिनय द्वारा अभिव्यक्ति करते हुए सहृदय के चित्त में रसोत्पत्ति का आधायक तत्त्व मानते हैं। इस प्रकार नाट्य रसाश्रय हो जाता है। इसका लक्षण देते हुए आचार्य भरत कहते हैं- ‘‘त्रैलोकस्यास्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम्’’2

      अर्थात् नाट्य इस सम्पूर्ण त्रैलोक के भावों का अनुकीर्तन है। इसी अर्थ में ‘आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी’ भी काव्य लक्षण देते हुए लिखते हैं- लोकानुकीर्तनम् काव्यम्3 कहने का भाव यह है कि सम्पूर्ण लोक के सुख-दुःख, लाभ-हानि, राग-द्वेष इत्यादि विषयों का चित्रण ही नाट्य है। यह चित्रण वस्तु चित्रण नहीं बल्कि रसयुक्त हुआ करता है। उसके सुखात्मक और दुःखात्मक सभी चित्रण आनन्ददायक ही हुआ करते हैं। यही नाट्य की विलक्षणता है। जब हम ‘उत्तररामचरित’ नाटक में सीता के वियोग में रामचन्द्र को रोते हुए देखते हैं तो वहाँ ‘‘अपि ग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्’’4 अर्थात पत्थरों को भी रोते हुए पाते हैं। तब भी उस करूण रस में आनन्द की अनुभूति होती है। नाट्य और लोक में यही अन्तर है कि नाट्य में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द होता है लेकिन लोक में जहाँ शोक की स्थिति है वहाँ हम आनन्द की कथमपि कल्पना नहीं कर सकते हैं।

      नाट्य साहित्य की एक अनुपम विधा है। कहा जाता है कि कोई भी विधा बिना अनुशासन की स्थायी नहीं बन पाती है। अतः नाट्य विधा को स्थिरता प्रदान करने के निमित्त हमारे आचार्यों द्वारा नाट्यशास्त्र की एक वृहद् परम्परा प्राप्त होती है। इस परम्परा में आचार्य भरत प्रणीत ‘नाट्यशास्त्र’ का महनीय स्थान है। लेकिन आचार्य भरत से पूर्व में भी ‘नाट्यशास्त्रीय’ ग्रन्थ विद्यमान थे जिनका उल्लेख करना उचित ही होगा। ‘नाट्यशास्त्र’ के आदिकर्ता स्वयभ्यू ब्रह्म कहे जाते हैं। शारदातनय ने उन्हें नन्दिकेश्वर का शिष्य बतलाया है। शारदातनय के अनुसार नाट्यवेद के आविस्कर्ता शिव हैं ब्रह्म नहीं, शिव ने नाट्य का सृजन कर तण्ड (नन्दिकेश्वर) को शिक्षा दी थी।5 ‘नाट्यशास्त्र’ और ‘अभिनयदर्पण’ के अनुसार भगवती पार्वती ने लास्य का आविष्कार किया था। लास्य का नाट्य विधा से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। नन्दिकेश्वर ने अपने भरतार्णव नाट्यग्रन्थ में पार्वती के ग्रन्थ का नाम ‘भरतार्थचन्द्रिका’ बतलाया है।6 नाट्यशास्त्रीय आचार्यों के रूप में वैदिक ऋषि याज्ञवल्क्य का भी नाम आता है। उनके ‘याज्ञवल्क्यस्मृति’ में बताया गया है कि सामगीतों के गायन के साथ भद्रक, अपरान्तक, प्रकरी, सरोबिन्दु, आवेणक, उल्लोप्यक और उत्तर नामक सात प्रकार के गीतों का उल्लेख किया है। महर्षि याज्ञवल्क्य जीव आत्मा को नट की उपमा से समझाते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार नट अनेक रूपों को बनाने के लिए रंगों आदि नाना प्रकार के वेष धारण करता है उसी प्रकार यह जीवात्मा भी तत्तत कर्मों के द्वारा नाना प्रकार के शरीर को धारण करता है।7 आचार्य नन्दिकेश्वर ने अपने भरतार्णव में आचार्य वृहस्पति का उल्लेख करते हुए उनके सत्ताईस हस्त विनियोगों का वर्णन किया है।8 महर्षि नारद ब्रह्मा के शिष्य एवं गान्धर्व के प्रतिपादक आचार्य थे,9 ब्रह्मा ने नाट्यवेद की रचना कर नारद को नाट्य प्रयोग के लिए नियुक्त किया था। ‘महाभारत’ में नारद को गन्धर्ववेद का प्रवर्तक कहा गया है।10 नाट्यशास्त्रीय आचार्यों में तुम्बुरू का भी नाम आता है जो नारद के समकालीन माने जाते हैं। ‘वाल्मीकिरामायण’ में तुम्बुरू का उल्लेख अप्सराओं के गान शिक्षक के रूप में आया है।11 स्वाति को ब्रह्मा ने नाट्य प्रयोग में वाद्य वादन के लिए नियुक्त किया था। वे संगीतशास्त्र के एक प्रामाणिक आचार्य माने जाते हैं। ‘अग्निपुराण’ में काश्यप को छन्द शास्त्रकार के रूप में उल्लेख किया गया है12 तथा आचार्य दण्डी के काव्यादर्श के ‘हृदयङ्गमा टीका’ में काश्यप को अलंकारशास्त्र का प्रणेता माना गया है13 नाट्यशास्त्र में वासुकि अथवा महानाग का उल्लेख देवताओं के साथ हुआ है। शारदातनय अपने ‘भावप्रकाशन’ में रसोत्पत्ति के प्रसंग में वासुकि के मत का उल्लेख किया है।14 वादरायण के रूप में उल्लेख नाट्याचार्य का रूप है नाट्यशास्त्र में उल्लेख मिलता है। नाट्यशास्त्र में भरत पुत्रों की सूची में वादरायण का नाम दिया गया है।15 नाट्यशास्त्र के अन्तिम अध्याय में कोहल के साथ वात्स्य, शान्डिल्य एवं धूत्र्तिल का नाम आया है।16 ये नाम अन्य आचार्य व भरत आदि के ग्रन्थों में किसी न किसी रूप में प्राप्त होते हैं इससे विदित होता है कि आचार्य भरत के पीछे नाट्य शास्त्र की एक वृहद परम्परा थी जिसके दृढ़ आधारशिला पर पैर रखकर भरत चले ही नहीं अपितु नाट्यशास्त्र की प्राचीन थाती को सहेजा और उसके प्रयोगधर्मिता को विकसित किया।

      इसी क्रम में अग्निपुराण का भी नाम आता है। यहाँ नाटक, पूर्वरङ्ग, वस्तुविधान, पात्र, अभिनय, वृत्ति एवं रस आदि विषयों पर बहुत ही सम्यक् विचार किया गया है। यहाँ सत्ताइस प्रकार के नाटकों का उल्लेख मिलता है-

नाटकं सप्रकरणं डिन इहामृगोऽपि वा।
ज्ञेयः समवकारश्च भवेत्प्रहसनं तथा।।
व्यायोग भाणवीथ्यंक त्रोटकान्यथ नाटिका।
सट्टकं शिल्पकः कर्णाएको दुर्मल्लिका तथा।
प्रस्थानं भाणिका भाणीं गोष्ठी हल्लीशकानि च।
काव्यं श्रीगदिनं नाट्यरासकं रासकं तथा।
उल्लाप्यकं प्रेङक्षणं च सप्तविंशतिधैव तत्।।17

      अर्थात यह दृश्य काव्य सत्ताईस प्रकार का होता है- नाटक, प्रकरण, डिम, इहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण वीथी, अंक, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, कर्ण, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशक, काव्य श्रीगदित, नाट्यारासक, उल्लायक प्रेक्षण। नाट्यशास्त्र में केवल दश प्रकार के रूपकों को ही बतलाया गया है। जबकि ‘साहित्यदर्पण’ में दश प्रकार के रूपक और अट्ठारह प्रकार के उपरूपकों की चर्चा की गयी है।18 अतः अग्निपुराण के रूपक का सत्ताईस भेद अपने आप में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां नाटक का प्रयोजन बताते हुए कहा गया है-

त्रिवर्गसाधनं नाट्यमित्याहुः कारण च यत्।19

      अर्थात् नाटक त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम की प्राप्ति) का मूल साधन है। तात्पर्य यह है कि नाटक से धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति होती है। यहां मोक्ष को सम्मिलित नहीं किया गया है। इसका कारण यह है कि शान्तरस को नाटक में स्वीकार नहीं किया जाता है। आचार्य धनंजय भी तीन ही नाट्य का प्रयोजन माने हैं।20 अग्निपुराण में पूर्वरङ्ग विधान पर भी विस्तृत चर्चा मिलती है। वहां कहा गया है-

इतिकर्तव्यता तस्य पूर्वरङ्गो यथाविधि

नान्दीमुख्यानि द्वात्रिशंङ्ानि पूर्वरङ्गके।।

देवतानां नमस्कारो गुरूणामपि च स्तुतिः।

ग्रोब्राह्मणनृपादिनामाशीर्वादादि गीयते।।21

      अर्थात् पूर्वरङ्ग में विधिपूर्वक नान्दी आदि वत्तीस अङ्गों का निर्वाह करना चाहिए। इस स्थल पर देवताओं को नमस्कार, गुरूजनों की प्रशंसा, गौ, ब्राह्मण और राजा के आशीष का गायन किया जाता है। पूर्वरङ्ग के रूप में जिन वत्तीस अङ्गों का उल्लेख किया गया है उसमें पांच प्रकार की नान्दी, पांच निर्देश, तीन आमुख, दो प्रकार के इतिवृत्त, पांच अर्थप्रकृतियाँ, पांच चेष्टाएं, पांच सन्ध्यिा और देश काल का संकलन है। इस प्रकार अग्निपुराण में समस्त वस्तु तत्व की भी विधिवत व्याख्या मिलती है। यहां इतिवृत्र के दो भेद बतलाए गये हैं-

सिद्धमुत्प्रेक्षितं चेति तस्य भेदावुभौ स्मृतौ।

सिद्धमागमदृष्टं च सृष्टमुत्प्रेक्षितं कवेः।।22

      अर्थात इतिवृत्त के दो भेद हैं- सिद्ध और उत्प्रेक्षित। आगम शास्त्र से प्राप्त कथानक सिद्ध कहलाता है और कवि कल्पना प्रसूत उत्प्रेक्षित कहा जाता है। नाट्य पात्रों के रूप में भी अग्निपुराण में वर्णन प्राप्त होता है। यहाँ नायक के सम्बन्ध में बताया गया है-

आलम्बनविभावोऽसौ नायकादिभवस्तथा।

धीरोदात्तो धीरोद्धतः स्याद्वीरललितस्तथा।।

धीरप्रशान्त इत्येवं चतुर्धा नायकः स्मृतः।

अनुकूलो दक्षिणश्चशठो धृष्टः प्रवर्तितः।।23

      अर्थात् यह आलम्वन वियाव नायकादि में ही होता है अथवा नायकादि को आलम्वन विभाव कहते है। धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशान्त ये चार प्रकार के नायक होते हैं। प्रत्येक भेद के अनुकूल, दाक्षिण, शठ और धृष्ट ये चार नायक के उपभेद हैं। इसके साथ ही पीठमर्द, विट और विदूषक इत्यादि पात्रों के भी विषय में विस्तारपूर्वक बताया गया है।

      नाट्य अभिनय में स्त्री पात्रों की महती भूमिका होती है। एतदर्थ अग्निपुराण में कौशिक का मत उल्लेख करते हुए तीन प्रकार की नायिकाओं का निर्देश किया गया है-

स्वकीया परकीया च पुनर्भूरिति कौशिकाः।

सामान्य न पुनर्भूरि इत्याद्या बहुभेदतः।।24

      अर्थात् कौशिक के मत में नायिकाएं तीन प्रकार की होती हैं- स्वकीया, परकीया और पुनर्भू। कई विद्वानों के विचार में सामान्य नायिका होती हैं, पुनर्भू नहीं होती है। इस प्रकार नायिका के अनेक भेद हो जाते हैं। इस प्रकार पात्रों के संदर्भ में भी आवश्यकतानुसार यहाँ चिन्तन किया गया है। नाट्य सदैव अभिनय के लिए ही जाना जाता है। आचार्य भरत से लेकर आधुनिक आचार्यों तक नाट्य के मूल धर्म के रूप में अभिनय को स्वीकार किया गया है। ‘अग्निपुराण’ में अभिनय के सम्बन्ध में कहा गया है-

अभिमुख्यं नयन्नर्थान्विज्ञेयोऽभिनयो बुधैः।

चतुर्धा संभवः सत्त्ववागङ्गहरणाश्रयः।।25

      अर्थात नाटक की वण्र्य-वस्तु को दर्शकों के समक्ष लाने वाला अभिनय ही होता है। वह अभिनय चार प्रकार का होता है- सत्त्वाश्रय, वागाश्रय, अंगाश्रय और आहरणाश्रय। जहाँ सुख-दुःख मनोभावों का अभिव्यंजन होता है उसे सत्त्वाश्रय अभिनय कहा जाता है। वाणी के द्वारा काव्य एवं सम्वादादि का अभिनय वाणाश्रय या वाचिक अभिनय कहलाता है। जिसमें विभिन्न प्रकार के अंगों का प्रदर्शन किया जाता है उसे अंगाश्रय या आङ्गिक अभिनय कहते हैं तथा वेश-भूषा आदि नेपथ्य-विधान से सम्बन्धित अभिनय आहरणाश्रय या आहार्य अभिनय कहलाता है। नाट्य प्रयोग की दृष्टि से वृत्तियों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। नायक के व्यापार को वृत्ति कहते हैं। ‘अग्निपुरण’ में वृत्तियों के संबंध में कहा गया है-

क्रियास्वविषमा वृत्तिभारत्यारभटी तथा।

कौशिकी सात्त्वती चेति सा चतुर्धा प्रतिष्ठिता।।26

      अर्थात् क्रियाओं (नायकादि के कार्यों) में नियमपूर्वक व्यवहार को वृत्ति कहते हैं। इसके भारती आरभटी कौशिकी (कौशिकी) और सात्त्वती ये चार भेद हैं। ये वृत्तियाँ पात्रनिष्ठ होती हैं, पात्रों के क्रिया-कलाप का नियमपूर्वक व्यावहार वृत्ति कहलाती है। यह एक ऐसा अभिनय व्यापार है जिसका कर्ता स्वहित की साधना से सम्बन्धित नहीं होता है अपितु सामाजिक का रसास्वादन ही इसका मूलोद्देश्य हुआ करता है। वृत्ति इत्यादि के अतिरिक्त यहां गुण और अलंकार के विषय में भी विस्तार पूर्वक विमर्श किया गया है। गुण के विषय में अग्निपुरण में कहा गया है-

अलंकृतमपि प्रीत्यै न काव्यं निर्गुणं भवेत।

वपुष्यललिते स्त्रीणां हारो भारायते परम्।।27

      अर्थात जिस प्रकार असुन्दर शरीर वाली नारियों के लिए रत्नाहार भार बन जाता है उसी प्रकार माधुर्यादि गुणों से रहित काव्य अलंकृत होने पर भी आह्लादक नहीं होता है। यहां श्लेष आदि दश गुण माने गये हैं। अलंकारों के रूप में भी यहां शब्दालंकार28, अर्थालङ्कार29 और शब्दार्थालकार30 की चर्चा की गयी है। अग्निपुराण में रस का बहुत ही सम्यक् विवेचन किया गया है। रस ही नाट्य (काव्य) प्राण होता है। रसौ वै सः31 इस वैदिक श्रुति के आधार पर रस को आनन्द स्वरूप ब्रह्म माना गया है। इसी श्रुतिवाक्य के आलोक में भारतीय मनीषियों ने जीवन के परम उद्देश्य के रूप में अलौकिक आनन्द को परिभाषित करने का प्रयास किया है। वही रस काव्यजगत् में अपने अनुभूयात्मकता के कारण विगलित वेद्यान्तर आनन्दम् के रूप में स्वीकार किया जाता है। रस जीवन का सार है। यह प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान रहता है और अवसर पाकर प्रस्फूटित हो जाता है। उस रस के विषय में अग्निपुरण में कहा गया है-

अक्षरं परमं ब्रह्म सनातनमजं विभुम्।
वेदान्तेषु वदन्त्यैकं चैतन्यं ज्योतिरीश्वरम्।।
आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन।
व्यक्ति सा तस्य चैतन्यचमत्कार रसाह्वया।।31

      अर्थात् वह परमब्रह्म परमेश्वर अक्षय है। वह शाश्वत अजन्मा और समस्त सृष्टि में परिव्याप्त है। वेदान्त ग्रन्थों में उसे अद्वितीय ज्योतिर्मान् और सामथ्र्यवान कहा गया है। उसका आनन्द स्वाभाविक है पर उसकी अभिव्यक्ति कभी-कभी होती है। उसकी अभिव्यक्ति का नाम चैतन्य, चमत्कार अथवा रस है। अतः अग्निपुराण के अनुसार ब्रह्म की अभिव्यक्ति का नाम रस है। यहां रस की संख्या नव बतलाई गयी है। शृंगाररस, हास्यरस, करूणरस, रौद्ररस, वीररस, भयानकरस, वीभत्सरस, अद्भुतरस और शान्तरस। शान्तरस यहां नाट्य रूप में स्वीकार नहीं किया गया है किन्तु नाटक प्रकरण में निर्दिष्ट होने के कारण उसका भी निरूपण किया गया है। जब विवेक, वैराग्य आदि के कारण कर्म में प्रवृत्ति नहीं होती तब शान्तरस होता है। अग्निपुराण का एक और विशेष मनत्वय है कि भारत भूमि ही नाट्य मर्यादा की पोशिका भूमि है। यहीं नाट्य पुष्पित एवं पल्लवित होने के योग्य है-

देशेषु भारतवर्षं कालेकृतयुगत्रयम्।
नर्ते ताभ्यां प्राणभृता सुखदुःखोदयः क्वचित्।।32

      अर्थात् नाटक के दृश्य तत्व सदा भारत के ही होने चाहिए और कालों में सत्युग, त्रेता और द्वापर इन तीनों का उल्लेख होना चाहिए। देशकाल के सम्यक् उल्लेख के बिना दर्शकों को सुख और दुःख की अनुभूति ठीक प्रकार से नहीं करायी जा सकती। अभिप्राय यह है कि जब तक नाट्य लोक से नहीं जुड़ता तब तक वह सामाजिक के र´्जन का विषय नहीं बन सकता है। जो लोक में होता है वही शास्त्र बनता है। वही नाट्य बनता है। इसलिए भारत जैसे देश की उर्वर भूमि में विकसित नाट्य यहां के इतिहास, भूगोल के साथ जुड़कर सामाजिक को रसानुभूति कराने में सक्षम हो सकेगा। यही रसानुभूति की प्रक्रिया है। वह सामाजिक के व्यवहार जगत् से सम्बन्धित होकर ही रसोद्रेक करता है। जिससे भारतीय संस्कृति का जुड़ाव भी और गहरा होता चला जाता है। किसी देश की संस्कृति उसकी पहचान होती है। उसकी र´्जन की विभिन्न शाखाएं उसे अत्यधिक समृद्ध बनाती है। इन्हीं सभी उपागमों के साथ अग्निपुरण का नाट्यशास्त्रीय सिद्धांत व्यापक एवं विलक्षण हो जाता है। इस प्रकार देखते हैं कि अग्निपुराण नाट्यशास्त्रीय सिद्धांत के महनीय अभिधानों को अपने साथ लेकर साहित्य जगत् में पर्दापण करता है और एक प्रतिमान को स्थापित करता है।  



संदर्भ -

1.         अष्टाध्ययी, 4/3/129

2.         नाट्यशास्त्र 7/108

3.         अभिनवकाव्यालङ्कारसूत्रम्, 1/1/1

4.         उत्तररामचरित 7/28

5.         भावप्रकाशन, पृ. 55-57

6.         भरतार्णव, 10/636

7.         याज्ञवल्क्यस्मृति, 3/162

8.         भरतार्णव 4/139-205

9.         द्विवेदी डाॅ. पारसनाथ नाट्यशास्त्र का इतिहास, पृ. 15

10.      महाभारत शन्तिपर्व, 168-58

11.      वाल्मीकिरामायण, 2/9/18

12.      अग्निपुराण 336/22

13.      काव्यादर्श- हृदयङ्गमा- 1/2 तथा 11/17 पूर्वेषां काश्यपवररूचि प्रभृतीनामाचार्याणां लक्षणशास्त्राणि संहृत्य पर्यालोच्य . . ।

14.      भावप्रकाशन, पृ.37

15.      नाट्यशास्त्र, 1/32

16.      नाटक लक्षण रत्नकोश, पृ. 109, 263, 306

17.      अग्निपुराण, 338/1-4

18.      साहित्यदर्पण, 6/3-6

19.      अग्निपुराण, 338/7

20.      दशरूपक, 1/16

21.      अग्निपुराण, 338/8-9

22.      वही, 338/18

23.      वही, 339/37-38

24.      वही, 339/41

25.      अग्निपुराण, 342/1

26.      वही, 340/5

27.      वही, 346/1

28.      वही, 343

29.      वही, 344

30.      वही, 345

31.      वही, 339/1-2

32.      वही, 338/27