Wednesday, 13 July 2022

स्वामी विवेकानन्द और आधुनिक संस्कृत साहित्य

स्वामी विवेकानन्द और आधुनिक संस्कृत साहित्य
              डा.संजय कुमार 
  सहायक आचार्य – संस्कृत विभाग
 डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर म.प्र. 
 न कोड - 470003 मो.न. 8989713997


             संस्कृत साहित्य चरित्र प्रधान साहित्य है |वह चरित्र की शिक्षा देता है और ऐसे समाज को गढ़ना चाहता है जिसका मानसिक स्तर ऊंचा एवं उन्नत बनें | राम, कृष्ण,के भांति महात्मा गांधी , रविन्द्रनाथ टैगोर , स्वामी दयानन्द सरस्वती और डा.भीमराव अम्बेडकर आदि ऐसे जीवन चरित हैं जिन्हें आधुनिक संस्कृत ने केवल अपनाया ही नहीं है बल्कि उनके आदर्शों ,चरित्रों ,मूल्यों को सर्व जन हिताय और सर्व जन सुखाय के रूप में प्रस्तुत किया है | ऐसे ही व्यक्तित्त्व के धनी स्वामी विवेकानन्द भी हैं जिनका जन्म 12 जनवरी 1963 ईस्वी को कोलकाता में हुआ था जिनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथदत्त था | विवेकानंद जी की माता का नाम श्रीमति भुनेश्वरी देवी तथा पिता का नाम श्रीविश्वनाथदत्त था| माता कुशल गृहिणी थी और पिता कोलकाता उच्च न्यायालय में एक वरिष्ठ वकील थे | जिसके कारण समाज में एक पारिवारिक प्रतिष्ठा बनी हुई थी |माता श्रीमति भुनेश्वरी देवी धार्मिक भावना से ओत-प्रोत महिला थी जिनके व्यक्तित्त्व का विशेष प्रभाव विवेकानंद के ऊपर पड़ा | दुर्भाग्य से पिता की असामयिक मृत्यु हो जाने पर भी विवेकानन्द कभी भी घबड़ाये नही बल्कि परिस्थिति का डट सामना किये | उन्हें जीवन की अनेक कठिनाइयों से जूझना भी पड़ा लेकिन उनका नाम नरेंद्र दत्त था| नरेंद्र का अर्थ होता है श्रेष्ठनर| इसलिए उन्होंने अपनी श्रेष्ठता का परिचय देते हुए संपूर्ण कठिनाइयों को पार कर विवेकानंद नाम से विख्यात हो गये | ऐसे महान कर्मयोगी साधक एवं समाज चिंतक की मृत्यु दुर्भाग्य से 4 जुलाई 1902 ईसवी रामकृष्णमठ बेलूर, कोलकाता में अनायास हो गयी थी | ऐसे महान कर्मयोगी साधक एवं समाज चिंतक की मृत्यु दुर्भाग्य से 4 जुलाई 1902 ईसवी रामकृष्णमठ बेलूर, कोलकाता में अनायास हो गयी थी |
          स्वामी विवेकानन्द के स्वप्नों का भारत ऐसा था जहां धर्म, जाति, ऊंच, नीच, लिंग- भेद के लिए कोई स्थान नहीं था| जिसके लिए उन्होंने वेदांत को सामने रक्खा और संपूर्ण सृष्टि की ईश्वर के अंश के रूप में व्याख्या किया | सबको समानता का अधिकार उनके द्वारा प्रदान करने की बात कही गयी | स्वामी विवेकानंद का ध्येय वाक्य था - उठो जागो और अब तक चलते रहो जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो | हमारे यहां वेदों में भी चरैवेति- चरैवेति की बात कही गई है| भारतीय परंपरा में माना जाता है कि जब व्यक्ति चलता है यानी कार्य करता है तभी तक उसकी भाग्य भी चलती है| इसलिए स्वामी जी ने सबको कार्य करने का उपदेश देते रहते थे |कर्म ही पूजा है और कर्म ही व्यक्ति को महान बनता है |
             स्वामी विवेकानंद मैकाले द्वारा व्यवस्थित शिक्षा प्रणाली के विरोधी थे क्योंकि इस शिक्षा का उद्देश्य केवल उद्यमी तैयार करना था ,वे ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहते थे जिससे व्यक्ति का संपूर्ण विकास हो, उसके व्यक्तित्व में उसका चरित्र और ज्ञान दर्पण की तरह स्वच्छ दिखाई दे| वे शिक्षा के द्वारा व्यक्ति को स्वयं के पैरों पर खड़ा करना चाहते थे|व्यक्ति स्वालंबी बने और आत्म ज्ञानी भी | स्वामी विवेकानंद ने प्रचलित शिक्षा को निषेधात्मक शिक्षा की संज्ञा देते हुए कहा था कि आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली है तथा जो अच्छा भाषण दे सकता है |पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती ,जो चरित्र निर्माण नहीं करती ,जो समाज की सेवा की भावना को विकसित नहीं करती, जो सिंह जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती ऐसी शिक्षा से भला क्या लाभ ? स्वामी जी शिक्षा के द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक दोनों जीवन को सुगम बनाना चाहते थे |लौकिक दृष्टि से शिक्षा का संबंध उन्होंने कहा था कि हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, आत्मबल बड़े, बुद्धि विकसित हो और मनुष्य स्वावलंबी बने और पारलौकिक दृष्टि से उन्होंने कहा था शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति करे| आज की शिक्षा प्रणाली कुछ उसी और पढ़ रही है लेकिन नई शिक्षा नीति में जो 64 कलाओं को आधार मानकर के शिक्षा संचालित करने की बात कही गई है वह भी हमारी भारतीय परंपरा के अनुकूल नहीं है| हमारी भारतीय परंपरा शिक्षा का उद्देश्य आत्म ज्ञान, ब्रह्म ज्ञान है, शिक्षा अमरता प्रदान करने वाली मानी गई थी| लेकिन नई शिक्षा नीति के द्वारा शिक्षा केवल श्रमिक वर्ग तैयार करने की ओर उन्मुख है| जो भारतीय परंपरा और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में उचित नहीं है| यह शिक्षा नीति श्रम के साथ ज्ञान से दूर ले जाने की ओर अग्रसर होगी | विवेकानन्द तो शिक्षा को विज्ञान और वेदांत की दृष्टी से व्यवस्थित करना चाहते थे |
              विवेकानन्द का व्यक्तित्त्व अत्यधिक विशाल है इसलिए अनेक भाषाओँ में उनके व्यक्तित्त्व को प्रकाशित करने के लिए कवियों ,आलोचकों ,समीक्षकों ने अनेक प्रकार से प्रयास किये हैं जिनका उद्देश्य स्वामी विवेकानन्द के आदर्शों पर चलने के लिए समाज को प्रेरित करना है |साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है अर्थात् काव्य रूपी दर्पण में समाज का प्रेरणात्मक व्यक्तित्व प्रकाशित रहता है | जिससे सम्पूर्ण समाज प्रेरणा लेता है | लौकिक दर्पण में और काव्य दर्पण में यही अन्तर है कि लौकिक दर्पण में जब तक सम्मुख विम्ब रहता है तभी तक उनमें प्रतिविम्ब दिखलाई पड़ता है लेकिन काव्य दर्पण में जब एक बार कोई व्यक्तित्व प्रतिबिम्बित हो जाता है तब वह विम्ब के न रहने पर भी भाषमान ही होता है | इसलिए संस्कृत कवियों के द्वारा स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व को विविधता के साथ प्रकाशित किया गया है | विवेकानन्द का ऐसा व्यक्तित्व है जिससे लोग युगों- युगों तक प्रेरणा लेते रहेंगे | उनका जीवन लोंगो के दुःख दर्द के समाप्त के लिए सदैव संलग्न रहा |यदि संस्कृत साहित्य में विवेकानन्द पर लेखन पर बात की जाय तो महाकाव्य ,नाटक ,गीति काव्य ,गद्य काव्य आदि सबमें मिलता है | यथा –त्र्यंबक शर्मा भंडारकर प्रणीत रसाभि -विवेकानन्दचरितम्, संनिधानम सूर्य नारायण प्रणीत विवेकानन्दचरितम्,श्री विश्वनाथ केशव छत्रे प्रणीत पी.के.नारायण पिल्लई प्रणीत विवेकानन्दम्, और विश्वभानु महाकाव्य | डा. यतीन्द्र विमल चौधरी कृत भारत विवेकम् ,डा.श्री धर भास्कर कृत विवेकानन्द विजयम् नाटक हैं |पलसुखे रचित विवेकानन्दचरितम्, गद्यकाव्य ,श्री के. एस. नागराजन रचित विवेकानन्दचरितम्, गद्यकाव्य तथा डा. यतीन्द्र विमल चौधरी रचित श्री श्री विवेकानन्दचरितम्, चम्पू काव्य आदि आधुनिक संस्कृत जगत आलोकित है |  
    स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्त्व , जीवन - दर्शन और चिन्तन को विभिन्न कवियों ने प्रकाशित किया है | त्र्यंबक शर्मा भंडारकर अपने महाकाव्य रसाभिविवेकानंदचरितम् में विवेकानन्द के भारतीय दर्शन के प्रति अनुराग को व्यक्त करते हुआ कहा है –आत्मेव नित्यमचलस्थितिभारतं न: शुद्धं प्रबुद्धमभयं परमद्वितीयम्|आचन्तशून्यमजशरमप्यमेयं देशस्य तस्य बलिनस्तनया|| यहाँ उनके मन भरतीय दर्शन के स्थितप्रज्ञ भाव को कवि ने व्यक्त किया है| इसी तरह विवेकानन्दचरितम् महाकाव्य में भारत देश की सांस्कृतिक समृद्धि के स्मरण के साथ वर्तमान भारत का यथार्थ चित्रण किया गया है |यहाँ पर रामकृष्ण परमहंश के प्रिय शिष्य विवेकानन्द के विषय में कहा गया है - श्रीराम कृष्ण प्रियशिष्यवर्य: प्रबोधयन् स्नेहमय लोकान्|विवेक आनन्द यति पृथिव्यां कालानुवतीविमुनिश्चकास || भारत एक कृषि प्रधान देश है इस लिए विवेकानन्द को कृषक जीवन और उसके खेत मनोहर लगते थे |इस सम्बन्ध विश्वभानु महाकाव्य में कहा गया है - गोधुम सान्द्रहरितां नयनस्य पुण्य धारां विदूर परिचुम्बितवक्रवालाम्|संस्कृत्य कर्षकजनै: परिलाल्यमानां केदार भूमि भविशत् विकस्वरात्मा|| इस तरह विवेकानन्द के राष्ट्र प्रेम ,धर्म ,अहिंसा ,सत्य ,शिक्षा ,पर्यावरण आदि विषयों को संस्कृत कवियों के द्वारा सामने लाने का प्रयास किया गया है | संस्कृत ही संस्कृति की सम्बाहिका है | जहाँ उत्तम चरित्र ,कर्म ,दर्शन ,साहित्य को लोक के कल्याण के निमित्त ही गढ़ा जाता है | विवेकानन्द का उज्ज्वल जीवन सदैव भारतीय मानस का प्रक्षालन करता रहेगा और एक राष्ट्र के अमर स्वरूप प्रस्तुत करता रहेगा जहाँ उच्च विचार एवं श्रेष्ठ शिक्षा व कर्म की पूजा होगी |
 सादर स्मृति में .......

Tuesday, 12 July 2022

भारतीय सांस्कृतिक विरासत का पर्व गुरुपूर्णिमा


                             डॉ. सञ्जय कुमार
            सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर ,( म.प्र.)
                                             Mo.No.8989713997,9450819699
                                          Email-drkumarsanjayBhu@gmail.com
         भारतीय संस्कृति में गुरु का विशेष महत्व माना गया है| गुरु ही मनुष्य में ज्ञान का आधान करता है| इसलिए आषाढपूर्णिमा के दिन गुरुपूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है| यद्यपि भारत देश ऋषि प्रधान देश रहा है, हर युग में ऋषियों के प्रति आदर - सम्मान का भाव देखने को मिलता है| काश्यप, आंगिरा ,भृगु ,वशिष्ठ, अगस्त्य, भारद्वाज ,जमदग्नि, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य , जैमिनी , बाल्मीकि, दुर्वाषा  आदि  की  एक वृहद ऋषि परंपरा देखने को मिलती   है | इन सभी के प्रति शिष्यों द्वारा अपार श्रद्धा का भाव भी  दृष्टिगोचर होता  है| यह देश ज्ञान वैभव का देश है |यहाँ अपरा और परा विद्याओं का संगम है | आत्मा तथा शारीर के साथ ही आदिभौतिक , आदिदैविक और आध्यात्मिक चिन्तन परम्परा का विकास ऋषियों के मनीषा से ही व्यक्त होती है | भारत में ज्ञान के मूलभूमि ऋषि ही हैं | क्योंकि सभी शास्त्र उन्ही के द्वारा श्रुत परंपरा से संरक्षित रहे  हैं | इसलिए ऋषि परंपरा को ही गुरुपरंपरा के रूप वन्दना की जाती है | लेकिन एक मान्यता के अनुसार महर्षि वेदव्यास का जन्म  आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हुआ था | उन्हीं के सम्मान में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिनही  गुरुपूर्णिमा पर्व का आयोजन होता है| ऐसा भी बताया जाता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्यों व मुनियों को सर्वप्रथम श्रीमाद्भागवद्पुरण का उपदेश दिया था| श्रीमाद्भागवद्पुरण  उनके अट्ठारह  पुराणों में इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें भगवत- भक्ति के द्वारा  मोक्ष का मार्ग  बतलाया  गया है| कुछ लोगों का यह भी  मानना है कि महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्मसूत्र को लिखना  इसी दिन प्रारंभ किया था| इसलिए वेदांत दर्शन के प्रारंभिक दिन को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है|  ब्रह्मसूत्र वेदान्त दर्शन का वह ग्रन्थ है  जो  जीव –व्रह्म की एकता की घोषणा करता है |यहाँ  यह भी बताना का उचित  होगा कि भक्ति काल के संत श्रीघासीदास का जन्म भी  आषाढ़पूर्णिमा के दिन ही  हुआ था| जो कबीर दास के शिष्य माने जाते हैं |पूर्णिमा के दिन का  भौगोलिक रूप से भी अत्यधिक  महत्व माना जाता है |इस दिन चंद्रमा का पृथ्वी के जल से सीधा संबंध होता है| फलत: समुद्र में ज्वार- भाटा उत्पन्न हो जाता है|  चंद्रमा समुद्र के जल को अपनी ओर खींचता है| यह क्रिया मनुष्य को भी प्रभावित करती है क्योंकि मनुष्य के शरीर में भी अधिकांश भाग जल का ही है |इसलिए मनुष्य के शरीर की  जल की गति बदल जाती है |गुण में भी परिवर्तन हो जाता है| आत्म- विस्तार की स्थिति बनने लगती है जिससे  एक अपूर्व आनंद की अनुभूति है |
      महर्षि वेदव्यास संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे| उन्हें कृष्ण द्वैपायन भी कहा जाता है | वे आदि  गुरु हैं| इसलिए उनके जन्मदिन आषाढ़पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के नाम से जाना जाता है |वेदांत दर्शन व अद्वैत वाद  के संस्थापक वेदव्यास ऋषि पाराशर के पुत्र थे तथा उनकी माता का नाम सत्यवती था |  पत्नी  आरुणि से उत्पन्न महान बाल योगी सुखदेव  इनके पुत्र  हैं| एक परंपरा के अनुसार पांडू, धृतराष्ट्र और विदुर भी महर्षि वेदव्यास  के संतान माने जाते हैं | वेदव्यास ने महाभारत, ब्रह्मसूत्र ,18 पुराण ,18 उपपुराण की रचना किए हैं |इसके अतिरिक्त इन्होंने वेदों को उनके विषय के अनुसार ऋग्वेद, यजुर्वेद ,सामवेद, अथर्ववेद के रूप में चार भागों में विभाजित किया है| महर्षि वेदव्यास की शिष्य परंपरा में  पैल ,जैमिनी, वैशंपायन, समन्तु मुनि , रोमहर्षण आदि का नाम महत्वपूर्ण रूप से सामने आता है| यह आषाढ़ पूर्णिमा गुरु महात्मा का पर्व है| इस दिन गुरु की पूजा का विधान शास्त्रों में मिलता है |गुरुपूर्णिमा वर्षा ऋतु में पङती   है | इस दिन से 4  महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान का प्रकाश चारों ओर बिखेरते हैं |यह 4 माह प्राकृतिक रूप से बहुत रमणीय  होता  है|  ना अधिक गर्मी पड़ती है ना सर्दी का भान होता है| इसलिए चाहे ज्ञान क्षेत्र हो या अध्ययन क्षेत्र हो दोनों दृष्टि से यह समय बड़ा ही उपयुक्त माना जाता है| ऐसे समय में साधक  द्वारा की गई साधना फलीभूत होती है| ठीक वैसे ही जैसे  सूर्य के ताप से तप्त  भूमि को वर्षा की शीतलता एवं पौधे उत्पन्न करने की शक्ति मिलती है वैसे ही गुरु के सानिध्य में उपस्थित होकर साधकों की  ज्ञानशक्ति  , भक्ति, शांति  और योग की प्राप्ति होती है|
 यद्यपि भारतीय संस्कृति  ऋषियों का आचरण –व्यावहार द्वारा परिष्कृत संस्कृति है | यहाँ पर ऋषियों –मुनियों के प्रति जीवन के प्रारम्भिक काल से ही श्रद्धा का भाव देखने को मिलता है | ऋषि अपने आचरण मात्र  से  शिष्यों के अन्त: करण में ज्ञान का प्रकाश प्रज्वलित कर देता है |ऋषि ज्ञान का  प्रकाश अत्यंत गंभीर ,गुरु  व भारी होता है | इसी लिए उपदेशक ऋषियों को गुरु की संज्ञा से विभूषित किया गया है |गुरु शब्द दो वर्णों के योग से बना है –गु और रु | गु का अर्थ होता है –अंधकार या अज्ञान  तथा रु का अर्थ होता है – हटाने वाला या अवरोधक | इसलिए गुरु शब्द का अर्थ अज्ञान को हटाने वाला या अंधकार को दूर करने वाला होता है | गुरु का ज्ञान भारी है ,गुरु का कार्य भारी है और गुरु की सेवा भी भारी ही है | इसलिए वह गुरु कहलाता है | गुरु ही अज्ञान तिमिर का अपने ज्ञानांजन शलाका से हरण कर देता है |यानि अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने का कार्य गुरु ही करता है | जिसके सम्बन्ध में ठीक ही कहा गया है –
                   अज्ञान तिमिरंध्श्च  ज्ञानांजन शलाकया |
                   चक्षुन्मिलितं   येन तस्मै श्री गुरुवे नम: ||
 एक  बात और ध्यान देने योग्य है कि गुरु का महत्व सभी धर्मों व सम्प्रदायों में है | जैन, बौद्ध , सिक्ख ,इसाई,पारसी,इस्लाम  आदि सभी किसी न किसी रूप में गुरु की सत्ता में विश्वास रखते है  | सभी गुरु का आदर करते हैं |क्योंकि गुरु ही सबके ज्ञान का आधार है | मैं ऐसा धर्म ,संप्रदाय ,जाति नहीं देखता हूँ जो विना गुरु का हो , सबके  अपने –अपने गुरु हैं |गुरु के महात्म्य के सम्बन्ध में आदिकवि वाल्मीकीय भी कहते हैं –
              स्वर्गोधनं वा धान्यं वा विद्या पुत्रा: सुखानि च |
                गुरुवृत्यनुरोधेन न किंचिदपि  दुर्लभम्   || (१/३०/३६)
अर्थात् गुरुजनों की सेवा का अनुसरण करने से स्वर्ग ,धन ,धान्य,विद्या ,पुत्र ,और सुख कुछ भी दुर्लभ नहीं होता है | यहाँ सेवा से अभिप्राय  गुरु का अनुशासन है, उसका निर्देश ही सेवा है | भारतीय परंपरा में गुरु को व्रह्म , विष्णु  और महेश के समकक्ष मानते हुए का गया है _
                   गुरुर्वह्मा  गुरुर्विष्णु  गुरुर्देवो महेश्वर:|
                 गुरु साक्षात् परव्रह्म तस्मै श्री गुरवे नाम ||
हिंदी के भक्तकवि तुलसीदास  भी गुरु -गौरव के विषय में कहा है –
                 श्रीगुरुचरन  सरोज रज निज मनु मुकुर सुधारी |
                 वरनऊँ रघुबर विमल  जसु जो दायक फल चारी ||
      इस प्रकार भारतीय संस्कृति  में गुरु का स्थान बहुत श्रेष्ठ है | सभी मनुष्य के जीवन में  ज्ञानी गुरु की महती आवश्यकता होती है  | गुरु ही जीवन लक्ष्य का प्रकाशक होता है | मनुष्य जीवन तो एक हाड.–मास के  पुतले  के समान है| उस पुतले को  ज्ञान संपन्न ,गुण सम्पन्न और विवेक संपन्न गुरु ही बनता है | उसके विना देवता भी अधूरे हैं |राम और  कृष्ण भी विना गुरु के ज्ञानी नहीं बन सके | गुरु शास्त्र और शस्त्र से  शिष्य का मार्ग प्रशस्त करता है | वही जीवन में परम ज्योति जलाता है |इतिहास साक्षी बिना गुरु के ज्ञान से कोई भी संवृद्ध नहीं हुआ है| यह गुरुपूर्णिमा पर्व समस्त ऋषि व  गुरुपरंपरा का प्रतीक शुभ दिवस है  |
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Tuesday, 16 November 2021

महर्षि बाल्मीकि का विश्व विख्यात रामायण और भ्रातृत्व स्नेह

( २० अक्तूबर ,२०२१ बाल्मीकि जयंती विषेश ) महर्षि बाल्मीकि का विश्व विख्यात रामायण और भ्रातृत्व स्नेह डा. संजय कुमार सहायक आचार्य –संस्कृत विभाग डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर ,म प्र .470003 मो. न. 8989713997 आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व भारतीय भूमि पर एक अद्भुत घटना के रूप में महर्षि वाल्मीकि का आविर्भाव हुआ जिन्होंने आदिकाव्य वाल्मीकि रामायण की रचना की |यह आदिकाव्य रामचरित के रूप में केवल प्रसिद्ध ही नहीं है अपितु यह आचरण, व्यवहार, जीवन- दर्शन ,कर्म ,त्याग ,प्रेम ,समर्पण और वैराग्य का ऐसा समुच्चय प्रस्तुत करता है जिसके कारण उसे भारतीय संस्कृति का प्रतीक माना जाता है| कथा प्रसिद्ध है कि व्याध के बाण से विधि हुए क्रौंच पक्षी के लिए विलाप करने वाली क्रोंची के करुण- क्रंदन को सुनकर महर्षि वाल्मीकि के मुख से अकस्मात ही प्रथम लौकिक छंद निकल पड़ा था- मा निषाद प्रतिष्ठास्त्वमगम:शाश्वती:समा: | यत क्रौंच मिथुनादेकमवधी: काममोहितम || अर्थात हे निषाद तुमने काम से मोहित इस क्रौंच पक्षी को मारा है अतः सदा- सदा के लिए प्रतिष्ठा को मत प्राप्त होओ| महर्षि वाल्मीकि के हृदय में स्थित शोक ही श्लोक रूप में परिणित होकर चतुर्विंशति साहस्री संहिता से युक्त बाल्मीकीय रामायण नाम से प्रसिद्ध हो गया|चतुर्विंशति साहस्री संहिता का अभिप्राय चौबीस हजार श्लोक से है|यह संख्या उतने ही हजार है जितने गायत्री मंत्र में अक्षर हैं| प्रत्येक हजार प्रथम गायत्री मंत्र के अक्षर से ही प्रारंभ होता है| यद्यपि महर्षि वाल्मीकि के जीवन परिचय के विषय में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त नहीं होती है| कहीं उन्हें बल्मीक( दीमक )के कारण बाल्मीकि नाम से अभिहित किया गया है तो कहीं जन- सामान्य से जुड़ा एक व्यक्ति बताया गया है| एक किंबदंती के अनुसार यह भी कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि प्रारंभ में चोरी का कार्य करते थे जिनका नाम रत्नाकर था| उस चोरी के कार्य से ही रत्नाकर अपने परिवार का भरण -पोषण करते थे |किसी समय उन्हें नारदमुनि से भेट हुई |उन्होंने रत्नाकर से पूछा कि यह चोरी का कार्य क्यों करते हो ? तब रत्नाकर ने उत्तर दिया हैं कि मैं इसीसे अपने परिवार का पालन- पोषण करता हूं| पुनः नारद ने कहा कि इससे पाप का भागी बनना पड़ेगा | इस पाप कर्म से अर्जित धन से जिस परिवार को पालते हो क्या वे भी इसके भागी बनेगें ? इस प्रश्न पर बाल्मीकि मौन हो जाते हैं और पूछने के लिए अपने परिवार के पास जाते हैं| परिवार के लोग सीधे-सीधे कहते हैं कि जो करेगा वह भ रेगा| यानी पाप कर्म तो आप कर रहे हैं तो पाप का फल भी आप ही भोगेगें | परिवार जनों की यह बात सुनकर महर्षि वाल्मीकि को बहुत ही कष्ट हुआ और वे महर्षि नारद के शरण में आ गए | महर्षि नारद ने उन्हें राम-राम का जांप मंत्र दिया और इसी राम नाम से वे रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि बन गये | पौराणिक मान्यता के अनुसार यह भी माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप और अदिति के नवे पुत्र वरूण और उनकी पत्नी चर्षणी के कोख से हुआ है| इन्हें भृगु का छोटा भाई भी कहा जाता है|अश्विन मास की शरद पूर्णिमा के दिन इनका जन्म हुआ था|इसलिए आश्विन पूर्णिमा को बाल्मिकीय जयंती के मनाया जाता है | इस दिन आकाश से अमृत की वर्षा होती है| जिसका भरतीय परम्परा में विशेष महत्व माना जाता है| इस तरह महर्षि बाल्मीकि कोई भी रहे हों यह अलग विषय है| लेकिन जो उनका अवदान है , उससे संपूर्ण भारत की प्रतिष्ठा विश्व के आकाश मंडल में व्याप्त हो गई है| इनकी कृति बाल्मीकीयरामायण को भारत का गौरव ग्रंथ कहा जाता है और महर्षि वाल्मीकि को आदि कवि | बल्मिकीयरामायण के राम से ही प्रभावित होकर विश्व की अनेक भाषाओं में रामचरित लिखा गया |संपूर्ण विश्व वाड्मय का प्रेरणा स्रोत बाल्मीकि रामायण को माना जाता है| क्योंकि यहां जो समाज दर्शन का प्रतिबिंबन किया गया है वह अन्यत्र दुर्लभ है |सभी साहित्य इसके त्याग, पारिवारिक संबंध ,सामाजिक संबंध , समर्पण और कर्तव्य से प्रभावित हैं| महर्षि बाल्मीकि ने ऐसे रामचरित का निर्माण किया है जिनका नाम सुनते ही प्रजा वत्सल राजा, आज्ञाकारी पुत्र ,स्नेही भ्राता, विपद ग्रस्त मित्रों के बंधु का चित्र हमारे मानस पटल पर अंकित हो जाते हैं |वहीं जनकनंदिनी सीता का नाम आते ही पतिव्रता स्त्री की ऐसी मूर्ति उपस्थित हो जाती है जो युगों युगों तक अपने आदर्शमय जीवन से सबके हृदय को रंजीत करती रहेगी| यदि पिता के स्नेह को देखा जाए तो वह पुत्र वियोग में अंतिम परिणति तक पहुंचता है| माता सदैव पुत्र का उपकार ही करती है और पुत्र का लाख अपकार करने वाली माँ को भी सदैव पूजनीय, वन्दनीय रूप में ही स्वीकार किया गया है| इस रामायण को मित्रता की कसौटी के रूप में भी देखा जाता है|इस तरह यह एक व्यावहारिक शास्त्र के रूप में सामने आता है | मानव जीवन में भ्रातृत्वभाव का यहां अद्भुत स्वरूप दिखलाया गया है |यहां राम के बिना लक्ष्मण, भरत , शत्रुघ्न या लक्ष्मण के बिना राम या भरत के बिना राम आदिका जीवन नगण्य है |यद्यपि बाली सुग्रीव को अत्यधिक प्रताड़ित किया हुआ रहता है फिर भी जब राम बाली का वध करते हैं तब सुग्रीव का भ्रातृत्व वियोग पाषाण हृदय को भी द्रवित करने वाला दृष्टिगोचर होता है |कुंभकरण की मृत्यु पर रावण का क्रंदन और रावण की मृत्यु पर विभीषण का रुदन भ्रातृ प्रेम के उत्कट निदर्शन के रूप में सामने आया हुआ है| इतना ही नहीं महर्षि वाल्मीकि ने तो पशु- पक्षियों के भ्रातृत्वभाव स्नेह को भी अपने रामायण में अंकित किया है|यहाँ संपाति और जटायु के मध्य भ्रातृत्व प्रेम को देखा जाए तो वह बहुत महत्वपूर्ण है| जब कपियों के मुख से जटायु के विनाश की बात संपाति सुनता है तो वह दु:खी होकर कहता है यह कौन है जो मेरे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय मेरे भाई जटायु के वध की बात कर रहा है| यह बात सुनकर मेरा ह्रदय कंपित हो रहा है| संपाति जटायु के गुणों को व्यक्त करता हुआ कहता है कि जटायु मुझसे छोटा , गुणज्ञ और पराक्रमी है| उसके बिना मैं जीवन धारण नहीं कर सकूंगा |रावण जैसा घमंडी भी अपने भाइयों से अगाध स्नेह करता था |कुंभकरण के मारे जाने पर वह विलाप करता हुआ कहता है कि अब मुझे राज्य से कोई प्रयोजन नहीं है |सीता को लेकर भी मैं अब क्या करूंगा| कुंभकरण के बिना मैं एक क्षण थी जीवित नहीं रहना चाहता हूँ| इस तरह अद्भुत रूप में महर्षि बाल्मीकि अपने आदि काव्य बाल्मीकि रामायण में भ्रातृत्व स्नेह का वर्णन किये हैं | उनके भ्रातृत्व प्रेम के विषय में यह श्लोक अत्यंत प्रसिद्ध है जिसमे वे कहते हैं- देशे देशे कलास्त्राणी देशे देशे च बांधवा: | तं तु देशे न पश्यामि यत्र भ्राता सहोदरा|| अर्थात स्थान- स्थान पर स्त्रियां मिल सकती है तथा बंदुजन भी प्राप्त हो सकते हैं परंतु मैं ऐसा कोई देश ,कोई स्थान नहीं देखता हूं जहां सहोदर भ्राता उन्हें इस जीवन में मिल सके| इस तरह से हम देखते हैं की यह बाल्मीकि रामायण आदि काव्य भारतीय संस्कृति, सभ्यता, जीवन मूल्य, दर्शन को प्रस्तुत करते हुए भ्रातृत्व स्नेह का अद्भुत रूप उपस्थित किया है |ऐसा भ्रातृत्व स्नेह संपूर्ण वांग्मय मैं दुर्लभ है |यह बाल्मीकीयरामायण मनुष्य के जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं का भी सहज समाधान प्रस्तुत करने के साथ यह राजधर्म, लोकधर्म, पर्यावरण,शिक्षा, स्वस्थ्य आदि से संबंधित सर्वत्र लोक कल्याण का विधान करता है|ऐसे आदि काव्य के प्रणेता महर्षि वाल्मीकि की जयंती है पर हम उन्हें शत-शत नमन करते हैं|

महात्मागांधी और आधुनिक संस्कृत साहित्य

महात्मागांधी और आधुनिक संस्कृत साहित्य डा. संजय कुमार सहायक आचार्य –संस्कृत विभाग डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर ,म प्र .470003 मो. न. 8989713997 भारत महापुरुषों का देश है | यहाँ पर मानव क्या ईश्वर भी अवतरित हुए हैं ,राम और कृष्ण को हमारी परम्परा में ईश्वर माना जाता है |इसी तरह चाणक्य ,चन्द्रगुप्त , महाराणा प्रताप ,गुरुगोविन्द सिंह , महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस सरदार बल्लभभाई पटेल बालगंगाधर तिलक आदि लोकनायक महापुरुष भी अवतरित हुए हैं जिनके पराक्रम ,पौरुष .त्याग और समर्पण से राष्ट्र का मस्तक सदैव गौरवान्वित होता रहता है |ऐसे ही महापुरुष महात्मा गांधी भी हैं ,जिन्हें राष्ट्रीय प्रतीक पुरुष के रूप में जाना जाता है |महात्मा गांधी का मूल नाम मोहनदासकर्मचंद गांधी था | जिनका जन्म ०२ अक्तूबर १८६९ ई.में गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान में हुआ था |महात्मा गांधी के पिता का नाम कर्मचंद गांधी तथा माता का नाम श्रीमति पुतली बाई था | गांधीजी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि सम्पन्न और अधिकार के प्रति सदा सचेत रहने वाले महामानव थे |भारतीय समाज एवं संस्कृति की गंभीर समझ उन्हें युवावस्था में प्राप्त हो गयी थी |उन्हें राष्ट्र और राष्ट्रीय समस्याओं की बहुत चिंता थी |जिसके समाधान के लिए वे सर्व प्रथम अध्ययन किये ,उनका मानना था कि अध्ययन ही सभी समस्याओं के निराकण का साधन है |इसलिए महात्मा गांधी आजीवन सबके लिए शिक्षा को अनिवार्य मानते थे | वे कहते थे कि शिक्षा सबको सर्व सुलभ होनी चाहिए | यद्यपि महात्मा गांधी का विवाह कस्तूरबा बाई मनक से १८८३ ई.में ही हो गया था लेकिन मन में बैठे राष्ट्रीयप्रेम की भवना , स्वतंत्रता की भावना और उच्च अध्ययन की अभिलाषा की पूर्ति में कोई व्यवधान कभी नहीं आया बल्कि वे भी अहर्निश महात्मा गांधी की सहगामी होकर एक साथ कदम मिलकर चलने वाली महिला थी | महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रमुख राजनेता एवं सुधारवादी चिन्तक के साथ - साथ वैश्विक समस्याओं के समाधान के प्रति प्रयत्नशील रहने वाले व्यक्ति थे | दक्षिण अफ्रीका इस बात का प्रमाण है | महात्मा गांधी के मन में भारत की दुर्दशा,बेरोजगारी ,स्वास्थ्य ,पर्यावरण और संस्कृति के उन्नयन की बेजोड़ कमाना थी | उन्होंने सविनय ,सत्याग्रह ,भारत छोडो आन्दोलनों द्वारा देश में ऐसी राष्ट्रीय भावना को जागृत किया जिससे भारत को स्वतंत्रता मिली |उनका मानना था प्रत्येक व्यक्ति या राष्ट्र की स्वतंत्रता उसका अधिकार है |किसी के लिए भी दासता या परतंत्रता अभिशाप है |महात्मा गांधी के कार्य ,सहस और धैर्य के कारण उन्हें कालिदास ,महात्मा ,बापू (पिता ),राष्ट्रपिता आदि नामों से उन्हें संबोधित किया जाता है |उनके जन्म दिवस २ अक्तूबर को गांधी जयंती और अंतराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है |महात्मा गांधी को एक राजनीतिज्ञ,अधिवक्ता ,पत्रकार ,दार्शनिक ,निबंधकार ,संस्मरण लेखक तथा क्रन्तिकारी लेखक के रूप में याद किया जाता है |उन्होंने अनेक पुस्तकों का प्रणयन भी किया है | जिनमें से कुछ प्रमुख है – सत्य के प्रयोग ,हिन्दस्वराज , दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास ,गांधी की आत्म कथा ,मेरे स्वप्नों का भारत सर्वोदय , गीता माता , ग्रामस्वराज, रामनाम ,महात्मा गांधी के विचार ,कुदरती उपचार ,आरोग्य की कुंजी ,सच्चाई भगवान है और सांप्रदायिक सद्भावना आदि |महात्मा गांधी के दो अस्त्र बहुत प्रसिद्द हैं – सत्य और अहिंसा ,इन्ही दो वैचारिक अस्त्रों से वे देश को आजादी दिलाये | ऐसे महान विचारक ,स्वतंत्रता सेनानी ,लेखक तथा समाजसुधारक की दुर्भाग्य बस ३० जनवरी १९४८ को मृत्यु हो गयी | महात्मा गांधी के मृत्योपरांत उन पर अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओँ में और अधिक ग्रन्थ लिखे जाने लगे | उनके मूल्य , जीवन- दर्शन ,आदर्श ,स्वतंत्रता आन्दोलन के कार्य को ,इतिहास आदि के ग्रंथों के साथ साथ साहित्य में भी साहित्यकारों ने गढ़ना प्रारम्भ कर दिया | जिसमे संस्कृत भी बढ़- चढ़कर सहगामी बनी क्योंकि संस्कृत का इतिहास साक्षी है |उसका तो ध्येय ही आदर्श चरित निर्माण है |उसी की पूर्ति में राम , कृष्ण भीष्म ,सीता ,कुंती ,द्रोपदी चन्द्रगुप्त आदि के साथ महात्मा गांधी जैसे महनीय व्यक्तित्व से आधुनिक संस्कृत आलोकित है |आधुनिक संस्कृत कवियों के द्वारा काव्य ,महाकाव्य ,नाटक ,खंड काव्य आदि के रूप महात्मा गांधी का चरित प्रकाशित है |आधुनिक संस्कृत कवि समवाय का एक बड़ा वर्ग या तो गांधी चरित को आदि से अंत तक प्रस्तुत किया है या तो उनके सिद्धांत सत्य ,अहिंसा आदि को सामाजिक धरातल पर उकेरा गया है| संस्कृत साहित्य में चरित लेखन की परंपरा महर्षि बाल्मिकीय प्रणीत रामायण से ही हो जाती है |उन्होंने आदर्श चरित के रूप में राम चरित को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया |इसी रूप में भारतीय समाज को उन्नतिशील बनाने और स्वतंत्रता तथा राष्ट्रीय भावना को जागृत करने के लिए आधुनिक संस्कृत साहित्य राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जीवन चरित आधारित साहित्य की सर्जना भी की गयी है | इस तरह यदि महाकाव्यों की बात की जय तो गांधीचरित नाम से अनेक महाकाव्य लिखे गए हैं, जिनमें कुछ प्रमुख हैं- स्वामी भगवदाचार्य का गांधीचरितम , इस महाकाव्य के तीन खंड – भारतपारिजात ,पारिजातापहार, तथा पारिजत्सौराभ हैं |जिनमें महात्मा गांधी के जन्म से लेकर दक्षिण अफ्रीका आदि का वर्णन करते हुए उनके स्वतंत्रता आन्दोलन के कड़े संघर्षों को दिखाया गया है |प्रभुदत्त व्रह्मचारी का गांधीनांदीश्रद्धाम्, साधुशरणमिश्र का गांधीचरितम् , विद्यानिधि का गांधीचरितम्~ (अप्रकाशित ) सुधाकरशुक्ल का गांधीसौगंधिकम् ,त्रिपुरारीशरण पाण्डेय का महत्मायन ,श्री मधुकरशास्त्री का गांधीगाथा , शिवगोविन्द त्रिपाठी का गांधीगौरवम् और प. क्षमाराव के द्वारा महात्मा गांधी जीवन चरित आधारित तीन महाकाव्य लिखे गए हैं – सत्याग्रहगीता, उत्तर सत्याग्रहगीता और स्वराजविजयम्| ये तीनों महाकाव्य महात्मा गांधी के विराट व्यक्तित्त्व को प्रकाशित करते हैं | प. क्षमाराव ने सत्याग्रहगीता महाकाव्य के एक स्थल पर महात्मा गांधी के शांति दर्शन के सार को बतलाती हुई लिखि हैं – दुर्बला ननु गण्यन्ते शांतिमार्गावालम्बिन:| परं सत्याग्रहाद् विद्धि नास्ति तीव्रतरं बलम्||१०/२५ || अर्थात् शांति के मार्ग पर चलने वालों को कमजोर समझा जाता है ,परन्तु यह जान लेना चाहिए कि सत्याग्रह से अधिक शक्तिशाली और कोई बल नहीं है |वहीँ आगे महात्मा गांधी के जीवटता , पौरुष, और भगवतस्वरूप को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा है – निक्षिप्तं विधिना तेजस्तस्मिन गंधौ महात्मनि|जन्मभूमिं तमोग्रस्तां विद्योतयितुमात्मन:|| न परं भारतं वर्ष विदुरा अपि भूमय: | भासिता:सत्यदीपेन ज्वालितेन महात्मा || तस्मादधर्मनाशाय प्रशान्ते: स्थापनाय च |गांधीरूपेण भगवानवतीर्ण: किमु स्वयम् ||१८/१५-१९ || अर्थात् महात्मा गांधी में ईश्वर ने एक तेज स्थापित कर दिया है ,जिससे अंधकार से व्याप्त पृथिवी को वे आलोक दे सके | केवल भारतवर्ष ही नहीं दूर – दूर के देश भी महात्मा के सत्यदीप के प्रकाश से आलोकित हैं |अत:ऐसा मालूम पड़ता है कि अधर्म के नाश व शांति की स्थापना के लिए स्वयं ईश्वर ही गांधी के रूप में अवतरित तो नहीं हो गये हैं?इसी तरह अनेक बातों को महात्मा गांधी के संदर्भ में यहाँ कहा गया है |गांधी सिद्धांत और व्यवहार को अन्य काव्यों में भी आधुनिक संस्कृत कवियों के द्वारा प्रस्तुत किया गया है |यथा रामजी उपाध्याय अपने द्वासुपर्णा संस्कृत उपन्यास में सुदामा और कौमुदी के माध्यम से गांधी के हिन्दस्वराज को व्याख्यायित किया है |प.प्रेमनारायण आदि ने महात्मा गांधी पर अनेक कविताओं का भी प्रणयन संस्कृत में किया है |मथुरा प्रसाद दीक्षित ने गांधीविजयम और डा.बोम्मकंठी रामलिंग शास्त्री ने सत्याग्रहोदय: नाटक लिखा है|इस तरह आधुनिक संस्कृत सहित महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को केवल साथ लेकर चलने वाला साहित्य नहीं है बल्कि उसे आत्मसात करने वाला साहित्य है | आधुनिक संस्कृत साहित्य के कवियों के द्वारा महात्मा गांधी को राष्ट्र उन्नायक ,स्वतंत्रता सेनानी ,सामाजिक चिंतक महामानव के रूप में चित्रित किया गया है जिनका आदर्श और व्यक्तित्व सभी मानव के लिय अनुकरणीय और कठिन समय में प्रेरणा प्रदान करने वाला है | ............................................................

आधुनिक संस्कृत और भारतीय ज्ञान परम्परा के संवाहक प्रभुनाथ द्विवेदी

आधुनिक संस्कृत और भारतीय ज्ञान परम्परा के संवाहक प्रभुनाथ द्विवेदी (पूण्यस्मरण ) डा .संजय कुमार सहायक आचार्य –संस्कृत विभाग डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर ,म प्र .470003 मो. न. 8989713997 Email-drkumarsanjaybhu@gmail.com आधुनिक संस्कृत के उच्च शिखर पर प्रतिष्ठित आचार्य प्रभुनाथ द्विवेदी का जन्म २५ अगस्त १९४७ ई.को मीरजापुर ,उत्तर प्रदेश के भैसा (कछवा) ग्राम में हुआ था |इनके पिता का नाम श्री नन्दकिशोर द्विवेदी तथा माता का नाम श्रीमति रामकुमारी देवी था | बचपन से ही द्विवेदी जी का विशेष लगाव संस्कृत भाषा साहित्य से था| जिसके कारण स्नातक विज्ञान विषय से उत्तीर्ण होने के बाद भी इन्होने संस्कृत विषय में स्नातकोत्तर और पी–एच .डी .की उपाधि प्राप्त कर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ,वाराणसी, उ.प्र. में जनवरी १९७८ सहायक आचार्य के पद पर न्यूक्त हो गए , यहीं सह आचार्य एवं आचार्य पद पर रहते हुए संकायाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद का निर्वाह करते हुए जून २०१० ई. में सेवा निवृत्त हो गए लेकिन उनके ह्दय में विराजमान अध्यापकत्व उन्हें कभी भी सेवा निवृत्त नहीं होने दिया फलस्वरूप वे संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय ,वाराणसी , शंकरशिक्षायतन , नई दिल्ली , विश्वभारती, शान्तिनिकेतन (प.ब.),कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ,कुरुक्षेत्र एवं रानी पद्मावतीतारायोगतंत्र आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, शिवपुर ,वाराणसी में मानद आचार्य के रूप में अध्यापन करते रहे | द्विवेदी जी के अध्यापन के सामान ही लेखन कार्य भी महत्त्वपूर्ण है | उन्होंने कथासंग्रह के रूप में श्वेतदुर्वा , कथाकमौदी ,अंतर ध्वनि ,कनकलोचन,शालिवीथी आदि के साथ लगभग ६० ग्रंथों का प्रणयन किया है |इन्होने रामानन्दचरित एक संस्कृत भाषा में उपन्यास लिखा है | इस कोरोना महामारी पर भी इनके द्वारा कोरोनशतकम काव्य लिखा गया है |जिसमे १०८ श्लोक है |यह काव्य विषेश रूप से कोरोना से बचाव तथा वैश्विक परिदृश्य के साथ ही राजनीतिक दृष्य को भी उपस्थित करता है | २०१८ ई .में इनके द्वारा स्वच्छ्ताशतकम काव्य की रचना की गयी जिसमे सम्पूर्ण भारत को स्वच्छ रखने की कमना की गयी है |प्रभुनाथ द्विवेदी अंग्रेजी भाषा के अच्छे जानकर थे |इन्होंने अभी- अभी सनातन धर्म पर एक ग्रन्थ लिखा है |अलंकारोदारणम यह ग्रन्थ वस्तुतः किसी अंग्रेजी ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद है | इनके द्वारा इसके अतरिक्त २२९ शोध निबन्ध ,२४५ ललित निबन्ध भी द्विवेदी जी के प्रकाशित हैं | प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी जी के अध्यवसाय का यह प्रमाण है कि उनके निर्देशन में ३६ शोधार्थी शोध उपाधि प्राप्त किये हैं | द्विवेदी जी के आकशवाणी और दूरदर्शन पर ९१ प्रसारण कार्यक्रम भी हुए हैं |इनके कृतित्त्व और व्यक्तित्व पर अनेक विश्वविद्यालयों में शोधकार्य भी चल रहा है | डा.प्रभुनाथ द्विवेदी के साहित्यिक अवदान पर विभिन्न संस्थाओं से ३४ पुरस्कार दिए गये है जिनमे राष्ट्रपति पुरस्कार(२०१७ ) साहित्य अकादमी पुरस्कार (२०१४ ) बाल्मिकीय पुरस्कार , बाणभट्ट पुरस्कार ,कालिदास पुरस्कार ,श्रीरामानंदचार्य पुरस्कार मुख्य हैं |प्रो.द्विवेदी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी , विद्वान, महामनीषी थे |विषम परिस्थिति में कभी भी विचलित नहीं होते थे,ह्दय रोग से पीड़ित होने पर भी सतत अपने लेखन कार्य से भारतीय ज्ञान परंपरा को सुगम और सुबोध बनाने का प्रयत्न करते रहे | लेकिन दाम्पत्य जीवन के घनीभूत प्रेम अनुरागी पत्नी श्रीमति निर्मला देवी के स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण ईधर कुछ दिनों से हतास और निराश हो गए थे जिसके कारण अचानक मस्तिष्क में विकार उतपन्न हुआ और लाख चिकित्सीय प्रयास करने पर भी १५ नवम्बर ,२०२१ को मध्य रात्रि में अपने नश्वर शारीर कि छोड़कर शिवसायुज्य के लिए अनन्त पथ के गामी हो गए | संस्कृत के ऐसे महामनीषी के देव लोक गमन पर हम अपनी पूत ह्दय भावांजलि अर्पित करते हैं |

Tuesday, 22 June 2021

संस्कृत अनुवाद के अग्रदूत महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी

संस्कृत अनुवाद के अग्रदूत महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी ( जन्म जयंती विशेष-5 जून) डॉ.सञ्जय कुमार सहायक आचार्य-संस्कृत विभाग डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर,म.प्र. मो. न. 8989713997 Email- drkumarsanjaybhu@gmail.com विश्व साहित्य में संस्कृत साहित्य का स्थान श्रेष्ठ है।इसका व्याकरण और भाषा चिन्तन का जो स्वरूप निर्मित किया गया है वह अद्भुत है। बाल्मीकि, कालिदास,अश्वघोष,भारवि,माघ, भवभूति, बाणभट्ट , दण्डी और श्रीहर्ष आदि कवियों ने संस्कृत काव्य गरिमा की धवल अजस्र धारा को प्रवाहित किया है।यह प्रवाह केवल यहीं तक प्रवाहित नहीं हुआ बल्कि आज तक अपने प्रवाहमान स्थिति में वर्तमान है। रामजी उपाध्याय,रेवाप्रसाद द्विवेदी, श्रीनिवास रथ, शिवजी उपाध्याय, अभिराराजेन्द्र मिश्र, राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रभुनाथ द्विवेदी इत्यादि के साथ महात्मा पं.प्रेमनारायण द्विवेदी ने भी आधुनिक संस्कृत सरिता का जो जलप्लावन किया है वह बारिश की फूहार जैसी मनोरम और शीतलता प्रदान करने वाली है।इन आधुनिक संस्कृत कवियों में महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी का स्थान इस लिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्होंने अपने मौलिक रचनाओं के साथ संस्कृत अनुवाद की जो परम्परा विकसित की वह अतुलनीय है। उन्होंने हिन्दी, बुन्देली, ब्रजभाषा,अवधी आदि भाषाओं के अनेक काव्यों का संस्कृत भाषा में लगभग २१ हजार श्लोकों के रूप में अनुवाद किया है। जिसके लिए द्विवेदी जी को अनुवादक शिरोमणि भी कहा जाता है। महात्मा पं. प्रेमनारायण द्विवेदी का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जनपद अन्तर्गत बड़ा बजार क्षेत्र में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी दिन सोमवार ५ जून,१९२२ ई.को हुआ था। इनके पिता का नाम परमानन्द द्विवेदी तथा माता का नाम रूक्मिणी देवी था। इनके पिता पं. परमानन्द द्विवेदी धार्मिक एवं कर्मकांड से जुड़े विद्वान ब्राह्मण थे।जिनका प्रभाव बालक प्रेमनारायण द्विवेदी पर भी पड़ा।पं.प्रेमनारायण द्विवेदी को बचपन से ही भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति अगाध स्नेह और विश्वास था। जिसके कारण उनका जीवन सहज और अत्यंत सरल था। उनके मन में किसी के प्रति राग-द्वेष की भावना रंच मात्र भी नहीं रहा करती थी। सबके कल्याण में अपने कल्याण की भावना प्रबल थी। उन्हें लोकयश या आत्मा प्रसिद्धि का स्पर्श नहीं था केवल कर्म करने का विश्वास ही उनका आत्मविश्वास था, जिसके कारण लोग उन्हें महात्मा कहते थे। अंग्रेजी शासन की भारत दुर्दशा के साक्षी थे।इस लिए भारतीय धर्म, संस्कृति ज्ञान, विज्ञान के मूल्य को समझते थे और सबको समझाने का भी प्रयास करते थे।उनका मानना था कि भारतीय धर्म और संस्कृति में वह चेतनता है जो शाश्वतता की ओर मनुष्य को प्रवृत्त करती है। पं.द्विवेदी जी की प्रारम्भिक शिक्षा सागर स्थित चकरा घाट के संस्कृत विद्यालय से सम्पन्न हुई। विद्यालयी शिक्षा क्विंस कालेज, वाराणसी से सम्पन्न हुई तथा विश्वविद्यालयी शिक्षा उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। जिसका नाम अब डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय हो गया है। यही से महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी जी स्नातक तथा स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण कर 1965 ई.में 'वैश्णव पुराणों में आचार समीक्षा' विषय पर पी-एच.डी.की उपाधि प्राप्त की थी। पं.प्रेमनारायण द्विवेदी जी जन्मजात एक शिक्षक थे। उन्हें पढ़ाने का बहुत शौक था।फलत: उन्होंने 1944 ई.में अध्यापन कार्य प्रारंभ कर दिया था। द्विवेदी जी अपने अध्यापकीय रुचि के कारण खुरई ,बारधा, गढ़ाकोटा आदि के संस्कृत विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया था।अनन्तर 22 जुलाई 1955 ई.में उनकी नियुक्ति मोराजी प्राथमिक शाला में हो गयी।1958ई. में आप संस्कृत शिक्षक के रूप में पदोन्नत होकर मोतीलाल नेहरू माध्यमिक विद्यालय कटरा, सागर,म.प्र. में पहुंच गये। वहीं शिक्षण कार्य करते हुए जून 1980ई में सेवानिवृत्त हो गए। लेकिन वे केवल सरकारी विद्यालय की सेवा से निवृत्त हुए न कि अपने अध्यापकीय जीवन शैली स और लेखन कार्य से। वे पद प्रतिष्ठा से सदा दूर एक साधक की भांति जीवन व्यतीत करने के पक्षधर थे । उन्हें सागर से बहुत लगाव था जिसके कारण अनेक महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में सेवा के अवसर को उन्होंने छोड़ दिया। लेकिन कर्म में इतनी बड़ी शक्ति होती है कि इच्छा न रहते हुए भी उसका फल मिलता ही है। सेवा निवृत्ति के बाद पं.प्रेमनारायण द्विवेदी ने संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में अतिथि आचार्य के रूप में अध्यापन कार्य किया तत्पश्चात सामवेद संस्कृत महाविद्यालय, सागर में प्राचार्य के रूप में भी अपने दायित्व का निर्वहन किये थे। प्रेमनारायण द्विवेदी किसी विश्वविद्यालय में स्थाई रूप से शिक्षण कार्य न करते हुए भी संस्कृत साहित्य का जो प्रकाश पुंज प्रकाशित किया वह विश्व संस्कृत आलय के समान अगाध और महत्वपूर्ण है। उन्होंने 'काव्य निर्झर' और 'स्तुतिकुसुममाला' नामक मौलिक रचनाएं की हैं। इसके साथ-साथ लघुकाव्य संग्रह के रूप में अनेक पद्य 'विविधकाव्य संग्रह' के नाम से प्रकाशित है ।इस संग्रह में अनेक समसामयिक विषयों पर संस्कृत भाषा में पद्य प्रकाशित हैं। संयोग से विश्व पर्यावरण दिवस के दिन ही द्विवेदी जी का जन्म दिवस भी पड़ता है इसलिए उन्होंने पर्यावरण से सम्बन्धित अनेक संस्कृत पद्यों भी की रचना की है। पं. प्रेमनारायण द्विवेदी के द्वारा जो संस्कृतानुवाद की परम्परा विकसित की गई है वह बहुत महत्वपूर्ण है। संस्कृत काव्यों का अन्य भाषाओं में अनुवाद की परम्परा तो मिलती है लेकिन अन्य काव्यों का संस्कृत में अनुवाद कम ही मिलते हैं। द्विवेदी जी ने हिन्दी, बुन्देली, अवधी, ब्रजभाषा आदि भाषाओं की रचनाओं का छन्दमय संस्कृतानुवाद किया है। सबसे बड़ी बात उनके अनुदित साहित्य की यह है कि कहीं भी उनमें भाव और गाम्भीर्यता में कोई कमी नहीं बल्कि उत्तरोत्तर काव्य गुणों से समन्वित तत्वों को ग्रहण किया गया है। उन्होंने तुलसीदासकृत ये श्रीरामचरितमानस का ‘श्रीमद्रामचरितमानसम्’ नाम से, विहारी सतसई का ‘सप्तशती’ संग्रह नाम से संस्कृत भाषा में अनुवाद किया है।साथ ही तुलसीदास , सूरदास के पद्यों का संस्कृत अनुवाद “तुलसीसूरकाव्यसंग्रह” के रूप में किया है। हिन्दी के अन्य कवियों कबीरदास, मीरा, रसखान,उद्धव, जयशंकर प्रसाद, महादेव वर्मा, आदि के साथ बुन्देली कवि ईसुरी तथा ब्रजभाषा के कवि पद्माकर के भी अनेक कविताओं का पं. प्रेमनारायण द्विवेदी संस्कृत अनुवाद किए हैं। इस तरह द्विवेदी जी का अनुदित साहित्य विशाल और उन्नत है। संस्कृत भाषा में प्रेमनारायण द्विवेदी से बड़ा अनुवादक आज तक कोई नहीं हुआ है इस लिए उन्हें संस्कृत अनुवाद का अग्रदूत भी कहा जाता है। पं.प्रेमनारायण द्विवेदी की सारस्वत साधना के लिए भारत सरकार ने संस्कृत विद्वत् सम्मान एवं राष्ट्रपति सम्मान से विभूषित किया है। दिल्ली संस्कृत अकादमी तथा कालिदास संस्कृत अकादमी आदि के द्वारा भी इन्हें प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।पं. प्रेमनारायण द्विवेदी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के आधार पर डांकटर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन, तथा केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, (भोपाल परिसर) मध्यप्रदेश से अनेकों शोध कार्य हुएं हैं। इस प्रकार पं.प्रेमनारायण द्विवेदी विना थके साहित्य सर्जना में आजीवन संलग्न रहे। सदैव नित नूतन साहित्य से संस्कृत साहित्य एवं भारतीय संस्कृति को समृद्ध करने में अहम भूमिका का निर्वाह किये हैं। उनके काव्य और अनुदित साहित्य दोनों ही भारतीय ज्ञान- विज्ञान, परम्परा, दर्शन, धर्म और संस्कृति की प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। उनका अनुदित साहित्य भारतीय जीवन दर्शन का स्पष्ट झांकी प्रस्तुत करता है और पाठक को काव्य लोक में प्रतिष्ठित करता है।जीवन के अन्तिम क्षणों में भी अध्ययन,लेखन, और अध्यापन की सारस्वत साधना करते हुए २८अप्रैल, २००६ ई. को अपने भौतिक शरीर का त्याग कर देवलोक में प्रतिष्ठित हो गये। बताया जाता है कि महात्मा पं. प्रेमनारायण द्विवेदी महाप्रयाण के दिन प्रयाण से कुछ क्षण पूर्व 'हृदि तोषो नानीत:' कविता लिखे तदोपरांत पद्मासन में ओंकार मंत्र के ध्वनि के साथ अपनी पंच भौतिक शरीर को त्याग कर हमेशा हमेशा के लिए अनन्त में विलीन हो गये। ऐसे संस्कृत के समुपासक महात्मा प्रेमनारायण द्विवेदी के जन्म जयंती के अवसर पर हम उन्हें शब्द्कुशुमांजलि अर्पित करते हैं।