Friday, 22 July 2022

बालगंगाधर तिलक की राष्टवादी पत्रकारिता


                                                  (जयंती विशेष)

                             डॉ. सञ्जय कुमार
                           संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,सागर ,( म.प्र.)
                                             Mo.No.8989713997,9450819699
                                          Email-drkumarsanjaybhu@gmail.com
                                                   भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और राष्ट्रवाद के जनक बालगंगाधर तिलक का जन्म  23 जुलाई 1856  ईस्वी में  हुआ था |  इनके पिता का नाम श्री गंगाधरपंत था तथा जो एक  मराठी पाठशाला में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत थे| बालगंगाधर तिलक को  जीवन की थाती  पिता से ही प्राप्त हुई थी | उन्हीं से  प्रेरणा प्राप्त करके बालगंगाधर तिलक भारतीय स्वतंत्रता, भारतीय संस्कृति,अशिक्षा , गरीबी  और भारतीय दुर्दशा आदि समस्याओं पर विचार करते थे एवं समाधान का चिंतन करते थे |वे ऐसे देश की कल्पना करते थे जो स्वतंत्र हो ,जहाँ के लोग अपने मन के अनुसार कार्य कर सके और मन की बात कर सके |  मनुष्य स्वतंत्र जन्म लिया है इसलिए स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने का वह अधिकारी है | इसी  लिए उन्होंने एक नारा दिया - स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है |यह नारा इतना लोकप्रिय  हुआ कि प्रत्येक भारतवासी इस नारे पर कुर्बान होने के लिए तत्पर हो गया | स्वतंत्रता की चाहत और बढ़ने लगी |बच्चे ,बूढ़े ,जवान सबमें स्वतंत्रता भूख  अग्नि के समान बढ़ने लगी और देश स्वतंत्रता के लिए अति उत्साहित हो गया | जब बालगंगाधर तिलक इस धरा –धाम जब  पर अवतरित हुए तब भारत अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा था | देश की विषम अवस्था जग जाहिर थी |लोग हताश –निराश थे |आशा की एक किरण भी दूर –दूर तक नजर नहीं आ रही थी |लेकिन माँ भारतीके कोख से उस समय  ऐसे अनेक रत्नों ने जन्म लिये जिन्मे बालगंगाधर तिलक एक थे |  
         उस समय  अशिक्षा, बेरोजगारी अपनी चरम पर थी और इससे भी कष्टकर थी   अंग्रेजों की परतंत्रता , जो प्रत्येक भारतीय के लिए अभिशाप बन गयी थी |  परतंत्रता मनुष्य की के लिए कलंक  के समान होती है|यह जीवन को निरुपाय बना देती है | जरा विचार कीजिए कि जब आप अपने मन की बात किसी से न कर सकते और न वह कर सकते हैं जिसे आपकी चेतना करना चाहती है| तो आप उस समय  स्वयं को कितना विवश और असहाय समझेगें | इस विकट समस्या से बालगंगाधर तिलक  देश को मुक्त करना चाहते थे | जिसके लिए वे  सबसे बड़ा अस्त्र शिक्षा और पत्रकारिता को मानते थे | वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जिससे भारत की आर्थिक दशा में सुधार हो और देश अंग्रेजों के शासन से मुक्त हो सके | आधुनिक शिक्षा को बालगंगाधर तिलक इसलिए अनिवार्य मानते थे क्योंकि अंग्रेजों का सामना बिना आधुनिक शिक्षा या भाषा को जाने संभव नहीं था | आधुनिक शिक्षा के द्वारा ही भारतीय समाज के पिछड़ेपन को दूर किया जा सकता है| जिसके लिए  वे 2 जनवरी 1880 में आगरकर और विष्णुशास्त्री  चिपलूणकर की सहायता से एक न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना किए| इस स्कूल में शिक्षक के रूप में महादेव जोशी और शिवराम आप्टे भी कार्यरत थे | शिवराम आप्टे संस्कृत के बड़े विद्वान अध्यापक थे |उन्होंने संस्कृत ,हिंदी, अंग्रेजी के अनेक  कोशों का निर्माण किया है   |
         बालगंगाधर तिलक शिक्षा के लिए पूरे भारत को आवाहन करते हुए किसी सभा में कहा था कि साथियों ! हमारा देश शिक्षा के अभाव में पिछड़े देशों में गिना जाता है| यही कारण है कि अंग्रेज भारत की जनता का शोषण कर रहे हैं| उन्हें गुलाम बनाकर रखें हैं | ऐसे में हर भारतवासी को शिक्षा प्राप्त करने की जरूरत है | इसके लिए हमने एक स्कूल का श्रीगणेश भी किया है |  इस स्कूल में भारत के सभी लोग आ सकते हैं ,यहां सभी को भारत की आधुनिक शिक्षा से अवगत कराया जायेगा | जिससे देश की जनता को बाहर की दुनिया का ज्ञान भी होगा | सभी  अपने देश की दशा को समझे , समाज की दशा को समझे| इससे उनके  व्यक्तित्व का  विकास होगा |अतः  मेरी आप सभी से प्रार्थना है कि आप हमारे स्कूल में आकर आधुनिक शिक्षा प्राप्त करें| बालगंगाधर तिलक कुप्रथा के रूप में बालविवाह, सतीप्रथा, पर्दाप्रथा,  विधवा दुर्दशा आदि का कारण अशिक्षा को ही मानते थे | इस तरह शिक्षा के द्वारा अपने देश को हर प्रकार से  स्वतंत्र और सशक्त बनाने का दृढ़ निश्चय बाल गंगाधर तिलक के मानस  में विद्यमान था |एक बात और महत्वपूर्ण है कि वे  शिक्षा को आय के साधन के रूप में नहीं मानते थे यही कारण था कि स्वयं स्थापित किया हुआ स्कूल जब डेक्कन एजुकेशन सोसायटी के अंतर्गत आ गया और सोसायटी द्वारा निरन्तर पैसे को लेकर तनाव बढने  लगा तो इन्होंने सोसायटी और स्कूल दोनों इस्तीफा दे दिया |  
        स्वतंत्रता के लिए  दूसरा  अस्त्र वे  पत्रकारिता को मानते थे | पत्रकारिता किसी समस्या को समाज के सामने बड़े प्रभावकारी  रूप से केवल  उपस्थित ही नहीं करती है बल्कि  उस समस्या से समाज को अवगत कराती हुई उसके समाधान का मार्गप्रशस्त करती है |इसलिए उन्होंने मराठी में केसरी  और अंग्रेजी में मराठा साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन भी प्रारम्भ  किया था| इन दोनों समाचारपत्रों से लोगों में राजनीतिक चेतना का गहरा प्रभाव  राष्ट्रीय स्तर पर पड़ा | स्वतंत्रता किसी देश के लिए क्यों आवश्यक है और अंग्रेजी सरकार भारत  के प्रति अपना क्या दृष्टिकोण रखते हैं एवं उनकी उपभोगवादी नीति को सबके सामने लाने में इन समाचारपत्रों की भूमिका अग्रणी थी  | बालगंगाधर तिलक का मानना था कि जब – तक अंग्रेजों का भारतीय जनता के प्रति  विचार और दृष्टिकोण सम्पूर्ण जन-मानस तक नहीं पहुचेगा तबतक स्वतंत्रता का संघर्ष राष्ट्र व्यापी नहीं बान सकेगा |पत्रकारिता ही देश और समाज को संरक्षण – संबर्धन प्रदान करने की सशक्त स्थली है | इस पत्रकारिता को जितने ईमानदारी और कर्मठता से संचालित किया जायेगा देश उतना ही सशक्त और उन्नतशील बनेगा | उन्हें अध्यात्म से बड़ा लगाव था जिसके पूर्ति के लिए वे निरंतर श्रीमद्भागवद्गीता का अध्ययन करते थे, परिणामत: उन्होंने गीतारहस्य का प्रणयन किया |जिसमें बालगंगाधर तिलक ने बताया है कि   मानवता का  नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना ही  श्रीमद्भागवद्गीता का सन्देश है | श्रीमद्भागवद्गीता  मनुष्य को संसार से कभी विमुख होने की प्रेरणा नहीं देती बल्कि निष्काम कर्म का प्रतिपादन करती है| देश सेवा का गुरुभार निष्काम कर्मयोगी के द्वारा ही संभव है | बालगंगाधर तिलक वास्तव में भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति बहुत निष्ठा भी रखते थे |उन्होंने वेदों में आर्कटिक होम नामक एक ग्रन्थ भी लिखा है जिसमें वेदों के कालखंड के सम्बन्ध में गंभीर विवेचना की गयी है | बालगंगाधर तिलक भारतीय जनता को एक  सूत्र में बाधना चाहते थे | जीवन की सुघरता समूह  में ही निखरती है| इसलिए  गणेश उत्सव और शिवाजी दिवस का आयोजन उनके द्वारा किया जाता था | बालगंगाधर तिलक का मानना था कि  इस भूमि पर जो लोग पैदा हुएं हैं ,जो लोग  यहाँ रहते हैं उन सब का कर्तव्य है कि इस भूमि के संरक्षण –संबर्धन में अपना योगदान दें | बालगंगाधर तिलक के व्यक्तित्व कृतित्व पर आधारित अनेक भाषाओं में काव्य रचनाएं  भी की गई है  जिसमें संस्कृत भाषा का भी  नाम आता है| माधवहरी अणे द्वारा तिलकयशोर्णव: नामक वृहद् महाकाव्य की रचना की गयी है| माधवहरी अणे के  बालगंगाधर तिलक राजनीतिक गुरु थे| तिलक की प्रेरणा से वे  स्वतंत्रता संग्राम के प्रहरी बने | इसलिए उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होकर  तिलक की राष्ट्रभक्तिमय   व्यक्तित्व इस महाकाव्य में प्रदान किया  है| तिलक गाथा के दूसरे बड़े संस्कृत कवि अप्पाशास्त्री राशिवडेकर का नाम आता है |  उनके द्वारा  तिलकमहाशयस्य कारागृहनिवास: नामक गीतिकाव्य लिखा गया है| इसमें अनेक पद्यों द्वारा  तिलक  के स्वतंत्रता संघर्ष और मांडले जेल की कार्यशैली को रेखांकित किया गया है |
   बालगंगाधर तिलक एक राष्ट्र प्रहरी के समान अडिग रूप राष्ट्र सेवा में तत्पर रहने वाले स्वतंत्रता सेनानी थे | वे कभी परिस्थिति से निराश होने वाले नहीं थे | उन्होंने  सदैव राष्ट्र सेवा को आगे रखा | पारिवारिक जीवन राष्ट्र सेवा में कभी बाधक नहीं अपितु साधक ही रहा |बालगंगाधर तिलक निरंतर अंग्रेजी सरकार की गलत  नीतियों का विरोध करते रहे | उनके फूट डालो और राज्य करो को कभी भी सफल नहीं होने दिए | उनके द्वारा होमरूल लीग की स्थापना की गयी |बताया जाता है कि 1915 ई.में पुणे में राष्ट्रवादियों का एक सम्मलेन आयोजित किया गया  था | जिसका आयोजन तिलक ने अपने साथियों के सहयोग से किया था | सम्मलेन में उन्होंने राष्ट्रवादी आन्दोलन के लिए लोगों से आवाहन किया तथा यह भी कहा कि अब देश में  होमरूल लाने की आवश्यकता है  |किन्तु नरमपंथियों द्वारा इस प्रस्ताव का विरोध किया गया लेकिन कुछ मतभेदों के साथ अन्तत:1916  ई.में होमरूल लीग की स्थापना हो गयी |जिसका उद्देश्य अंग्रेजी सरकार से वैधानिक रूप से स्वशासन ग्रहण करना था | इसके संस्थापक बालगंगाधर तिलक थे लेकिन उन्होंने इससे सम्बंधित किसी पद को स्वीकार नहीं किया था |
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Wednesday, 13 July 2022

रामजी उपाध्याय

कोरोना काल में पर्यावरण से तादात्म्य यानी जीवनरक्षा

कोरोनाकाल में पर्यावरण से तादात्म्य यानी जीवनरक्षा 
डॉ सञ्जय कुमार
सहायक आचार्य संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर,म.प्र
Mo. 8989713997
Email: drkumarsanjaybhu@gmail.com
र्यावरण दिवस पर विशेष आलेख 
पृथ्वी,जल,तेज, वायु और आकाश के समष्टि का नाम पर्यावरण है।यह हमारे जीवन का अभिन्न अंग है।हम अपने जीवन का कोई भी क्षण पर्यावरण से विरहित होकर नहीं व्यतीत करते हैं। पर्यावरण से ही हम सर्वतोभावेन सदैव पोषित होते हैं।यह हमे रहने के लिए आवास, खाने के लिए अन्न, पीने के लिए जल श्वास लेने के लिए वायु और पहनने के लिए वस्त्र और शरीर को पुष्ट करने के लिए तेज देता है। मनुष्य इन्ही पंचभौतिक तत्त्वों का साकार रूप है। इसलिए इन तत्वों से उसका सम्बन्ध स्वाभाविक ही है। पर्यावरण हमें सब कुछ देता है उसी से हमारा जीवन परिवर्धित होता है लेकिन बड़ी बात यह है कि बदले में हमसे कुछ अपेक्षा नहीं रखता। संसार में के सभी सम्बन्ध आदान प्रदान पर अवलम्बित होते हैं लेकिन पर्यावरण ऐसाहै जो केवल देने के लिए जाना जाता है।वह मनुष्य को अमृतमय अपना सत्व देकर सहज सम्बन्ध को स्थायित्व प्रदान करता है।वह हमे हर क्षण विना किसी भेद के देता रहता है।जो सदैव देता है वह देव है-यो ददाति सा देवता।
पर्यावरण प्राणिमात्र के कल्याण हेतु का विधान करता है।ऐसा करना उसके स्वभाव में है। उसके अन्दर न किसी के प्रति राग होता है और न द्वेष।वह सदैव निरपेक्ष भाव से रहते हुए लोक मंगल ही करता है।वह हमसे किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखता है लेकिन त्याग पूर्वक जीवन यापन की शिक्षा अवश्य देता है क्योंकि त्याग ही उसके संरक्षण मूल तत्व है।पर्यावरण यज्ञ स्वरूप है।यज्ञ उसे कहते हैं जो सदैव उपकार करे। पर्यावरण भी हमारा सदैव उपकार ही करता है,वह हमें जीवन देता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं-अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:।यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव:।।कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षर समुद्भवम्।तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।(श्रीमद्भगवद्गीता ३/१४-१५)
अर्थात् सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं,अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है।वृष्टि से यज्ञ होता है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है।कर्म समुदाय को तुम वेद से उत्पन्न और अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जानो। इससे यह सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम ब्रह्म परमात्मा सदा से ही यज्ञ में प्रतिष्ठित हो लोक का कल्याण करते हैं। सम्पूर्ण प्रकृति यज्ञमय है।यज्ञ एक सद्भावना का नाम है, प्रकृति पूजा का प्रतीक है। इससे विश्व का कल्याण होता है, वायुमंडल शुद्ध और पुष्ट होता है।
पर्यावरण का त्रिविध स्वरूप चाहे वह आधिभौतिक हो या आधिदैविक या उसका आध्यात्मिक स्वरूप हों।सभी एक दूसरे पर अवलम्बित हैं। समस्त पर्वत,पठार, नदी, जलाशय, सागर, वनस्पति पशु- पक्षी इत्यादि दृष्टिगोचर होने वाले पदार्थ पर्यावरण के भौतिक स्वरूप हैं। इनमें व्याप्त जीवनदायिनी शक्ति ही इनका आधिदैविक स्वरूप है।एक ही सत् चिद् आनन्द स्वरूप जो विविध रूप धारण किए हुए हैं वही पर्यावरण आध्यात्मिक स्वरूप है।ये सभी एक-दूसरे के बहुत निकट है।इसलिए भारतीय मनीषा सदा से पर्यावरण के प्रति महत्बुद्धि रख कर एकं सद् विप्रा बहुधा बदन्ति और ईशावास्यमिदं सर्वम् की भावना रखती है।
सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय पर्यावरण के प्रति दैवी भाव रखता है। सम्पूर्ण प्रकृति में देवत्त्व का ही बोध करता है।द्युलोक,अन्तरिक्ष लोक एवं पृथ्वी लोक की इसी महनीयता के कारण स्तुति की गयी है-द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वदेवा: शान्तिब्रह्म शान्ति: सर्वं शान्ति: शान्तिरेव शान्ति सा मा शान्ति शान्तिरेधि।(यजुर्वेद ३७/१७)
अर्थात् स्वर्गलोक , अंतरिक्षलोक तथा पृथ्वीलोक हमें शान्ति प्रदान करे।जल शान्तिप्रदायक हो,औषधियां तथा वनस्पतियां शान्ति प्रदान करने वाली हों। सभी देवगण शान्ति प्रदान करें। सर्वव्यापी परमात्मा सम्पूर्ण जगत् में शान्ति स्थापित करें। शान्ति भी हमे परम शांति प्रदान करे। उक्त मंत्र में सम्पूर्ण सृष्टि के पर्यावरणीय स्वरूप की मंगलकामना की गई है। चराचर जगत परम सत्ता का साकार स्वरूप ही है। ऋषियों ने मन्त्रों के माध्यम से पर्यावरण को देव यानि ईश्वर स्वरूप माना है।इसी भावना से मंडित होकर पं.राजगन्नाथ कहते हैं-धत्ते भरड़्कुसुमपत्रफलावलीनां, घर्म्यंव्यथा स्पृशतिसीतभवांरूजं च।यो देहमर्पयति चान्यसुखस्य हेतोस्तस्मै वदान्यगुरवे तरवे नमोऽस्तु।। (भामिनीविलास 92)
अर्थात् जो फूलों, पत्तों और फलों के बोझ को धारण करता है।धूप से उत्पन्न होने वाली व्यथा का अनुभव करता है और दूसरों के सुख के निमित्त अपने शरीर को समर्पित कर देता है,दानियों में श्रेष्ठ उस वृक्ष को नमस्कार है। इसी प्रकार सभी प्राकृतिक तत्व पशु-पक्षी,नदी,पर्वत पठार, जलाशय,सूर्य, चन्द्र, वायु, जल,पृथ्वी आदि सभी हमारे उपकारक हैं। इसलिए पूजनीय और संवर्धनीय हैं। इनमें दैवी निवास का भी यही संकेत है कि इनका प्रत्येक क्षण मानव रंजन के लिए ही समर्पित है। प्रकृति के लिए सब बराबर हैं चाहे वह विपन्न हो या साधन संपन्न। सबको वह समान भाव से ही रंजित करती है। इस लिए सबको समान मन से इसका संरक्षण करना चाहिए। किसी गांव में आग लगी हो तो वह किसी एक घर तक सीमित नहीं रहती है। यदि आप घर सुखपूर्वक सोते रहे तो एक-एक करके आग सबके घरों को जला डालेगी। यही स्थिति विकृत पर्यावरण का भी है।आज कोविड १९ से बचने के लिए सबसे अधिक आवश्यकता है अपनी प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाई जाय।यह प्रतिरोधी क्षमता स्वस्थ और अविकृत पर्यावरण से ही सम्भव है। क्योकि पुष्ट पर्यावरण हमारे शरीर के अंदर प्रतिरोधी क्षमता का विकास करता है।इसलिए आइए हम पर्यावरण को बचाएं पर्यावरण हमें बचाएगा। अभी तक विश्व जलवायु समस्या, आपदा को लेकर दुनिया भर में जितने भी सम्मलेन और कन्वेंशन हुए हैं वे इस बात पर जोर देते रहे हैं कि पर्यावरण की अहम भूमिका हमारे जीवन के लिए है तो हमें इसके संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए किन्तु चिंताजनक यह है कि दुनिया के विकसित देश कचरा कि समस्या को दिन-प्रतिदिन बढ़ा रहे हैं और समुद्र, नदियाँ और सामरिक महत्त्व की चीजें बहुत ही बुरी स्थिति में पहुँचने जा रही हैं. प्रश्न यह है कि यदि यह सब अंधाधुंध तरीके से होता रहा तो जिस पर्यावरणीय-देवत्त्व की संकल्पना हम अपने पर्यावरण के सदर्भ में कर रहे हैं, उसका सत्व बचा रह सकेगा?

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कोरोना काल में जीवन रक्षक योग

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस विशेष 
      कोरोना काल में जीवनरक्षक योग
                  
                   डॉ.सञ्जय कुमार
                    सहायक आचार्य
 संस्कृत विभाग, डाक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय ,
सागर ,म.प्र.
                                                                    drkumarsanjaybhu@gmail.com
                                                                  Mo.No.8989713997

योग हमारे जीवन का महामूल्य है। इससे पंचभूतात्मक शरीर और मन स्वस्थ रहता है।यह मनुष्य जीवन को सुवर्धित करता है तथा चिर सजग प्रहरी के भांति मनुष्य की रक्षा करता है। उसके रोम-रोम को पुलकित करता है और जीवन आयु को आगे बढ़ाता है।साथ ही स्वस्थ चिन्तन - मनन की प्रक्रिया विकसित कर यथार्थ का बोध कराता है। यही बोधात्मक प्रक्रिया उसे दर्शन की श्रेणी में प्रतिष्ठित करती है। इसलिए मनुष्य जीवन के लिए योग का अत्यधिक महत्व है। मनुष्य को अपने जीवन शैली में योग को उसी प्रकार उतारना चाहिए जिस प्रकार वह नियमित रूप से भोजन और जल को ग्रहण करता है। आज योग को जीवनचर्या का अंग बनाने की आवश्यकता है। वैसे तो योग का निर्देश वैदिक युग से ही प्राप्त होता है। लेकिन उसको व्यावहारिकता प्रदान करने वाले महर्षि पतञ्जलि ही हैं। उन्होंने परम्परागत रूप से प्राप्त योग को स्वयं धारण किया तत्पश्चात् उसे लोक कल्याण की दृष्टि से योगसूत्र के रूप में प्रतिष्ठित किया।वे योग के विषय में कहते हैं-योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।(योगसूत्र 1/2) अर्थात् चित्तवृत्तियों का निरोध योग है।चित्त का चांचल्य स्वभाव है। फलस्वरूप चित्त विषयों की ओर दौड़ता है।जिसके निरोध (रोकने)के दो उपाय हैं-वैराग्य और अभ्यास। सभी प्रकार की इच्छाओं से विरक्तभाव वैराग्य है और चित्त को स्थिर करने के लिए योग साधनों का अनुष्ठान रूप प्रयत्न करना अभ्यास है।योग के साधन हैं-यम, नियम,आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान,और समाधि। यही योग के आठ अंग कहे जाते हैं।वितर्क जन्य बाधाओं से रहित होकर इनका निरन्तर अनुष्ठान करने से योगाभ्यासी को लौकिक एवं पारलौकिक सुख की प्राप्ति होती है।
  यह योग ही सभी कार्यों का मूल है। इसलिए कहा गया है-यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन।स धीनां योगमिन्वति। ऋग्वेद-( 1/18/7) अर्थात् योग के विना विद्वान का कोई यज्ञकर्म (शुभ कर्म) सिद्ध नहीं होता है। योग ही मनुष्य के सम्पूर्ण कामनाओं का भी मूल है। इससे हमारा शरीर और मन पुष्ट होता है। मनुष्य अपना सब कार्य मन और शरीर के द्वारा ही करता है।मन और शरीर की स्थिरता ही योग का महात्म्य है। यही हमारे स्वास्थ्य का नियामक भी है। अतः योग के सम्बन्ध में महाभारत में ठीक ही कहा गया है-न तु योगमृते शक्या प्राप्तुं सा परमा गति:।(महा.शांति.331/52) अर्थात् योग के विना परम महत्वशील कार्य सिद्ध नहीं होता है। योग के द्वारा ही मनुष्य अपनी कामनाओं को साकार रूप दे पाता है। इसके महात्म्य के सम्बन्ध में श्वेताश्वतरोपनिषद् में कहा गया है-पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते।न तस्य रोग न जरा न मृत्यु:प्राप्तस्य योगग्निमयं शरीरम्।।(श्वेताश्वतरोपनिषद् 2/12)अर्थात् पृथ्वी,जल,तेज, वायु और /आकाश इन पांच महाभूतों का सम्यक प्रकार से उत्थान होने पर तथा इनसे सम्बन्ध रखने वाले पांच प्रकार के योग सम्बन्धी गुणों की सिद्धि हो जाने पर एवं योग निर्मित अग्निमय शरीर को प्राप्त कर लेने वाले साधक को न तो रोग होता है,न बुढ़ापा आता है और न अकाल मृत्यु ही होती है।जब पंचभुतात्मक शरीर पंच महाभूतों से तादात्म्य स्थापित करती है तो एक अलग प्रकार की तन्मय शक्ति का संचार होता है जो हमारे जीवन रेखा को केवल बढ़ाती ही नहीं है बल्कि शरीर को पुष्ट और सशक्त भी बनाती है।
  हमारा यह शरीर एक रथ के समान है।आत्मा इस रथ का अधिष्ठाता स्वामी है,बुद्धि इस रथ का सारथी है।मन घोड़ों के मुख में बंधी लगाम या रस्सी है,इन्द्रियां घोड़े हैं।इन सबका स्वामी योग है क्योंकि यह यथार्थ दर्शन के साथ सबका पोषण करता है।योग केवल दर्शन नहीं जीवन जीने की कला है। जिसके आगे-पीछे मानव कल्याण ही।जिस प्रकार एक पिता अपने पुत्र का सर्वविध कल्याण चाहता है उसी प्रकार यह योग है इसे जो अपने जीवन में अपनाते हैं उनका योग भी सर्वविध कल्याण ही करता है।यह सुख-दु:ख में समभाव रहने के लिए प्रेरित करता।मन में अवसाद को रूकने नहीं देता और कठिन से कठिन समय में विचलित भी नहीं होने देता है। इसलिए आज सबको घर -परिवार के साथ योग को अपनाने की जरूरत है।वायरस कोविड-19 से सुरक्षित रहने की दृष्टि से अपनी प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाने के लिए योग सबसे सहज और सुरक्षित उपाय है।विशेषकर योगाङ्गों में आसन और प्राणायाम तो प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने की दृष्टि बहुत ही उपयुक्त हैं साथ ही आहार –विहार पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है| जो यम और नियम से सम्बंधित है | वस्तुत:यम और नियन हमारे आचरण और व्यवहार को परिष्कृत करते हैं जिससे सयंमित जीवन विकास होता है | सयंमित जीवन आज इस विषम परिस्थिति का समाधान है |त्यागपूर्वक जीवन जीने का उपदेश उपनिषदें भी देती हैं |  
   जैसे एक अच्छे काम में एक- एक करके लोग जुड़ते चले जाते हैं और कारवां बनता चला जाता है वैसे ही लोगों को योग से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए । सौभाग्य से योग को आज अंर्तराष्ट्रीय दिवस के रूप भी मान्यता मिल गई है जो प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव की बात है। योग जाति-धर्म से ऊपर उठकर मानव मात्र के लिए कल्याण का विधान करता है यह किसी में भेद नहीं अभेद का अनुशासन मानता है। इस धरा धाम के लोगों को अपना मानता है। सबको समान भाव से योग फल देता है।इसलिए सम्पूर्ण पृथ्वी के लोगों को योग से तादात्म्य स्थापित कर जीवेम शरद:शतम् की संकल्पना पूर्ण करनी चाहिए।